• HI
    • AR Arabic
    • CS Czech
    • DE German
    • EN English
    • ES Spanish
    • FA Farsi
    • FR French
    • HI Hindi
    • HI English (India)
    • HU Hungarian
    • HY Armenian
    • ID Bahasa
    • IT Italian
    • JA Japanese
    • KO Korean
    • MG Malagasy
    • MM Burmese
    • NL Dutch
    • NL Flemish
    • NO Norwegian
    • PT Portuguese
    • RO Romanian
    • RU Russian
    • SV Swedish
    • TA Tamil
    • TH Thai
    • TL Tagalog
    • TL Taglish
    • TR Turkish
    • UK Ukrainian
    • UR Urdu
    • VI Vietnamese
Publication date 20 अक्टू. 2026

मेरी भेड़ें मेरी आवाज़ सुनती हैं; मैं उन्हें जानता हूँ, और वे मेरे पीछे चलती हैं।

Publication date 20 अक्टू. 2026

आज सुबह मैं दुआ करने की कोशिश कर रही थी, लेकिन चाहे मैंने कितनी भी कोशिश की, मन में आने वाले ख़याल, परेशानियाँ और तरह-तरह की रुकावटें बार-बार मेरा ध्यान भटका रही थीं। आख़िरकार मैंने अपनी जगह बदल ली, और उस छोटे से बदलाव ने मुझे यीशु मसीह के साथ वह बातचीत करने में मदद की, जिसकी मुझे उस वक़्त ज़्यादा ज़रूरत थी।

हमारी रूहानी ज़िंदगी की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह नहीं है कि ख़ुदा की आवाज़ मौजूद नहीं है, बल्कि यह है कि बहुत सी आवाज़ें उसके साथ हमारा ध्यान भटकाती रहती हैं। हमारे ख़याल, ज़िम्मेदारियाँ, परेशानियाँ, ध्यान भटकाने वाली बातें और हमारे जज़्बात अक्सर उस बात को दबा देते हैं जो ख़ुदा बहुत नर्मी से हमसे कहना चाहता हैं।

हमें सोच समझकर अपने लिए ऐसी जगह बनानी होगी जहाँ हम उसे सुन सकें।

वक़्त के साथ मैंने सीखा है कि ख़ुदा की आवाज़ सुनना ज़ोर लगाने से कम और ख़ामोशी में ठहरने से ज़्यादा जुड़ा हुआ है। यह इतना धीमा हो जाने के बारे में है कि हम उसकी मौजूदगी को महसूस कर सकें और उसके कलाम पर ग़ौर कर सकें। जब मैं लगातार बाइबल पढ़ने और दुआ में वक़्त बिताती हूँ, तो मैं अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में उसकी आवाज़ के अंदाज़ को और बेहतर पहचानने लगती हूँ।

ख़ुदा आम तौर पर हमारा ध्यान उसकी ओर लगाने के लिए ज़बरदस्ती नहीं करता। इसके बजाय, वह हमें अपने साथ एक रिश्ते में बुलाता हैं। उसकी आवाज़ अक्सर सुक़ून, एहसास, स्पष्टता और उसके कलाम के मुताबिक़ चलने की दिशा लेकर आती है। जितना ज़्यादा हम बाइबल के कलाम से वाकिफ़ होते जाते हैं, उतना ही बेहतर हम यह पहचानने के क़ाबिल होते जाते हैं कि जो हम अपने अंदर महसूस कर रहे हैं, वह सच में उसकी तरफ़ से है या नहीं।

*“मेरी भेड़ें मेरी आवाज़ सुनती हैं; मैं उन्हें जानता हूँ और वे मेरे पीछे चलती हैं।” - यूहन्ना १०:२७

यह आयत हमें याद दिलाती है कि सुनना उसके मौजूद होने का एक हिस्सा है। अगर हम उसके हैं, तो हमें उसकी आवाज़ पहचानने के लिए बुलाया गया है। ऐसा हम एकदम से पूरी तरह नहीं सीखते, बल्कि धीरे-धीरे सीखते जाते हैं। यह आवाज़ पहचानने की क़ाबिलियत प्रदर्शन से नहीं, बल्कि रिश्ते से बढ़ती है।

फ़रमाँबरदारी अक्सर सुनने से शुरू होती है। आगे बढ़ने से पहले हमें सुनना होता है। अमल करने से पहले हमें हासिल करना होता है। जब हम सुनने के वक़्त को जल्दबाज़ी में पीछे छोड़ देते हैं, तो इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि हम ख़ुदा की मर्ज़ी के मुताबिक़ चलने के बजाय अपनी समझ और अंदाज़ों के आधार पर फ़ैसले करने लगते है।

आज कुछ देर के लिए ठहरकर और सिर्फ मुश्किल वक़्त या किसी बड़े फैसले के समय ही नहीं, बल्कि अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी ख़ुदा की आवाज़ सुनने के लिए वक़्त निकाले, चाहे आप काम कर रहे हों, आराम कर रहे हों या लोगों के साथ बातचीत कर रहे हों, अपने दिल में यह एहसास पैदा करे कि ख़ुदा आपके साथ मौजूद हैं और वह आपसे बात कर रहे हैं।

आप एक चमत्कार हैं।

Jenny Mendes
Author

Purpose-driven voice, creator and storyteller with a passion for discipleship and a deep love for Jesus and India.