लेकिन कलाम पर अमल करने वाले बनो, महज़ सुनने वाले नहीं जो ख़ुदको धोखा देते हैं।
हमने यह पिछले पुरे सप्ताह ख़ुदा की फ़रमाँबरदारी के अर्थ को समझने में समय बिताया है।
जब मैं इस सफ़र पर ग़ौर करती हूँ, तो मैं एक सरल लेकिन ताक़तवर सच्चाई पर लौटती हूँ: फ़रमाँबरदारी हर दिन किया जाने वाला एक चुनाव है। यह ऐसी चीज़ नहीं है जिसे हम संभालकर रख सकें या ग़ैर-यक़ीनी से नजरअंदाज़ कर सकें। इसे वर्तमान में जीना होता है।
बाइबल के हीरोज़, जैसे अब्राहाम, दाऊद, पतरस और दूसरे लोगों ने, जिन्होंने असफ़लता के पलों का सामना किया, वह इस बात की गवाही देते है कि उनकी असफ़लता की शुरुआत ख़ुदा की नाफ़रमानी के एक फ़ैसले से हुई थी। वे सभी हमें इस बात से आगाह करते है कि लगातार नाफ़रमानी पछतावे की ओर ले जाती है। साथ ही, यह हमें एक अलग रास्ता चुनने का अवसर भी देता है, ऐसा मार्ग जो नम्रता, तत्परता और ख़ुदा की मर्ज़ी के साथ मेल रखने से पहचाना जाता है।
हर दिन हमारे सामने वही बुनियादी फ़ैसला होता है: क्या हम ख़ुदा के रास्ते पर भरोसा करेंगे, या अपने ही सहारे पर निर्भर रहेंगे? यह फ़ैसला हमेशा बड़ा या असाधारण नहीं होता, लेकिन इसकी अहमियत हमेशा होती है।
*“लेकिन कलाम पर अमल करने वाले बनो, महज़ सुनने वाले नहीं जो ख़ुदको धोखा देते हैं।” - याक़ूब १:२२
यह आयत हमें सिर्फ़ जानने और सुनने से आगे बढ़कर उसे अपनी ज़िंदगी में अमल करने की चुनौती देता है। ख़ुदा का वचन सुनना अहम है, लेकिन उसके अनुसार जवाब देना और उस पर चलना ही वह जगह है जहाँ ज़िंदगी में हक़ीक़त में बदलाव नज़र आता है।
आओ हम फ़रमाँबरदारी को चुनें, इसे सिर्फ़ पूरा करने के लिए कोई ज़िम्मेदारी समझकर नहीं, बल्कि उस ख़ुदा के प्रति अपनी प्रतिक्रिया के रूप में जिसने हमसे मोहब्बत की है, जो हमारी अगुवाई करता है और जो जानता है कि हमारी ज़िंदगी के लिए सबसे अच्छा क्या है।
मैं जानती हूँ कि आप भी यही चाहते हैं! आओ, हम मिलकर दुआ करें:
ऐ आसमानी पिता, आज मैं पूरे मन से तेरे पीछे चलने का चुनाव करती हूँ। मेरी सहायता कर कि मैं सिर्फ़ तेरे वचन को सुननेवाली न रहूँ, बल्कि उस पर चलनेवाली भी बनूँ। मेरे क़दमों की अगुवाई कर, मेरे फ़ैसलों को आकार दे और मेरी सहायता कर कि मैं लगातार फ़रमाँबरदारी में चलती रहूँ। तेरी उस रहमत के लिए शुक्रिया जो मुझे संभालती है और तेरी मौजूदगी के लिए शुक्रिया जो मेरी अगुवाई करती है। यीशु मसीह के नाम में, आमीन।