कुम्हार के हाथ में मिट्टी का बर्तन बिगड़ गया, तो उसने उसे फ़िर से दूसरा बर्तन बना दिया, जैसा उसे ठीक लगा।
क्या आपको लगता है कि आप इस क़दर टूट चुके हैं कि अब दोबारा ठीक नहीं किया जा सकता? क्या आपने कभी ऐसा कुछ किया है जिसके बारे में आपको लगा हो कि अब उसे कभी सही नहीं किया जा सकता? क्या आपने कभी अपनी उस नाकामी को अपनी रूह से जोड़ लिया है?
मैंने किया है। मेरी ज़िंदगी में भी ऐसे पल आए हैं जब मुझे लगा कि मुझमें कोई कमी है… मैं टूट चुकी हूँ… मेरे दाग़ कभी मिट नहीं सकते। और अगर मैं ईमानदारी से कहूँ, तो इनमें से कुछ एहसास मेरी अपनी पसंद और मेरे अपने फ़ैसलों की वजह से भी आए।
यह बात मुझे इस आयत की याद दिलाती है:
*“और जो बर्तन वह मिट्टी से बना रहा था, वह उसके हाथ में बिगड़ गया; तब उसने उसे फ़िर से दूसरे बर्तन के रूप में बनाया, जैसा उसे बनाना अच्छा लगा।” - यिर्मयाह १८:४
इस आयत की एक बात मुझे मोहब्बत से भर देती है। मिट्टी कुम्हार के हाथों में बिगड़ गई थी, लेकिन कुम्हार की वजह से नहीं। फ़िर भी… कुम्हार ने उसे फेंक नहीं दिया!
ज़रा ग़ौर से देखे कि नबी यिर्मयाह क्या कह रहा है। वह बर्तन देखने में चाहे ख़राब और बेकार दिखाई दे रहा था, लेकिन कुम्हार ने उसे दोबारा आकार दिया और उसे पहले से भी बेहतर बना दिया। मेरे लिए इसका मतलब यही है कि हमारी नाक़ामियाँ हमें ख़ुदा की नज़रों में नाक़ाबिल नहीं बनातीं!
ख़ुदा हमारी कमियों से आगे देखता है। वह हमारे अंदर छिपी क़ाबिलियत को भी देखता है।
बहुत बार हम अपने दाग़ों या अपने गुज़रे हुए उन पलों से अपनी पहचान बना लेते हैं जिससे हम घायल हुए थे। लेकिन ख़ुदा हमारी पहचान हमारी शर्म से नहीं, बल्कि अपनी रहमत से तय करता है।
हम ख़ुद के बारे में जैसा सोचते हैं, वह बहुत मायने रखता है, क्योंकि हमारा यक़ीन हमारे जीने के तरीक़े को बदल देता है। अगर हम यह मान लें कि हम इतने टूट चुके हैं कि दोबारा कभी ठीक नहीं हो सकते, तो हम उसी टूटेपन के साथ जीने लगेंगे।
लेकिन अगर हम यह यक़ीन करें कि ख़ुदा हमें फ़िर से बना रहा है, हमें पुनर्स्थापित कर रहा है, तो हम धीरे धीरे उसी सच्चाई के मुताबिक़ चलना शुरू कर देंगे।
हमारा काम यह चुनना है कि हम उस बात पर यक़ीन करें जो ख़ुदा हमारे बारे में कहता है। न कि उस बात पर जो हमारा अतीत कहता है। न उस बात पर जो शर्म हमें बताती है। बल्कि उस बात पर जो वह कहता है:
*“देखो, मैं एक नया काम कर रहा हूँ!” - यशायाह ४३:१९
यीशु मसीह आपके लिए वही करता है।
आओ, मिलकर मिलकर दुआ करें:
ऐ आसमानी पिता, मेरी मदद कर कि मैं ख़ुद को उसी तरह देख सकूँ, जैसे तू मुझे देखता है। मेरे बारे में मेरी अहमियत को लेकर जो ग़लत बातें मैंने मान ली हैं, उन्हें मेरे ज़हन से दूर कर। शुक्रिया कि मेरी ख़ामियाँ मेरी पहचान तय नहीं करतीं। मुझे याद दिला कि तू आज भी मेरी ज़िंदगी को अपने हाथों से गढ़ रहा है। यीशु मसीह के नाम में, आमीन।