मैंने तुम्हें चुन लिया है और तुम्हें ठहराया है, ताकि तुम जाकर फ़ल लाओ।
क्या स्कूल के दिनों में, या शायद बाद की ज़िंदगी में भी, कभी ऐसा हुआ है कि किसी चीज़ के लिए आपको सबसे आख़िर में चुना गया हो?
शायद बचपन में जब आपके दोस्त टीमें बना रहे थे, तब आपको सबसे आख़िर में अपनी टीम में लिया गया हो। या फ़िर बड़े होकर आपको किसी प्रमोशन के लिए नज़रअंदाज़ कर दिया गया हो।
मुझे याद है कि पी.टी क्लास के दौरान मुझे अक्सर सबसे आख़िर में चुना जाता था और आज भी मुझे उन यादों की चुभन महसूस होती है।
अगर आप भी ऐसा महसूस करते हैं, तो सबसे ताक़तवर सच्चाई को अपने दिल में थामे रखे कि यीशु मसीह ने आपको चुना है।
जब हम ख़ुद की तुलना दूसरों से करते हैं या महसूस करते हैं कि हम किसी और की तरह नज़र नहीं आ रहे हैं या उतने असरदार नहीं हैं, तो हमारी पहचान अक्सर गुम होने लगती है। लेकिन तुलना सच्चाई को बिगाड़ देती है।
यीशु मसीह हमें कभी दूसरों के साथ तुलना करके नहीं मापता। वह हमें व्यक्तिगत रूप से बुलाता हैं, क्योंकि हम उसकी पहली पसंद हैं।
यीशु मसीह की दुनियावी सेवकाई के दौरान उसके आसपास बहुत से लोग थे, फ़िर भी उसने जानबूझकर अपने बारह चेलों को चुना। उनमें वे लोग भी शामिल थे जिनके नाम शायद ही कभी ख़ास बात के लिए जाने जाते हो। लेकिन उनकी कम पहचान या कम शोहरत ने उन्हें यीशु मसीह की पसंद से बाहर नहीं किया। बल्कि इस बात को तय कर दिया कि यीशु मसीह ने उन्हें जानबूझकर या सोच-समझकर चुना था।
यीशु मसीह कहता हैं:
*“तुम ने मुझे नहीं चुना बल्कि मैं ने तुम को चुन लिया है। मैंने तुम को मुक़र्रर किया कि जा कर फ़ल लाओ, ऐसा फल जो क़ायम रहे…” यूहन्ना १५:१६
यह आयत हमें याद दिलाती है कि हमारी बुलाहट हमारी अपनी क़ाबिलियत या प्रदर्शन पर आधारित नहीं है। हमने ख़ुदा के परिवार में अपनी जगह कमाई नहीं है। बल्कि हमे उसमें शामिल होने के लिए बुलाया गया है। यह सच्चाई हमारे मक़सद को देखने का नज़रिया बदल देती है।
अगली बार जब आपको लगे कि आपको नज़रअंदाज़ किया जा रहा है, तो ख़ुद को याद दिलाए: मैं भुलाई नहीं गई हूँ, मैं चुनी गई हूँ। जब आपको लगे कि आपकी कोई अहमियत नहीं है, तो ख़ुद को याद दिलाए: मुझे नियुक्त किया गया है। आपकी ज़िंदगी बे-मक़सद नहीं है। आपकी ज़िंदगी ख़ुदा की नज़र में सोच समझकर और एक ख़ास मक़सद के साथ रखी गई है।
ख़ुदा की बादशाहत में फ़लदायी होना हमेशा सार्वजनिक मंचों या दिखाई देने वाली सफ़लता जैसा नहीं होता। कभी-कभी यह निरंतरता, वफ़ादारी, दुआ, हौसला देने और ख़ामोशी से फ़रमाँबरदार बने रहने में नज़र आता है। और ये सारी चीज़ें ख़ुदा के लिए बहुत मायने रखती हैं।
कॅमरॉन ने इसी विषय पर ‘मंच या स्तंभ’ नाम से एक ख़ूबसूरत सीरीज़ लिखी है। मैं, आपको इसे पढ़ने की गुज़ारिश करती हूँ!