फ़िर आग के बाद एक धीमी आवाज़ आई। जब एलियाह ने उसे सुना, तो उसने अपना लिबाज़ अपने चेहरे पर डाल लिया।
हम १ राजा अध्याय १९ में नबी एलियाह के साथ अपने इस सफ़र के आख़री दिन पर पहुँचे हैं। हमने एलियाह को उस वक़्त से देखा, जब वह थका हुआ, टूटा हुआ, मायूस और जीने की उम्मीद छोड़ चुका था। फ़िर उसने फ़रमाबरदारी के साथ ख़ुदा की हिदायत मानी, जब ख़ुदा उसे एक और लंबे और मुश्किल वीरान जगह के सफ़र पर ले गया।
आख़िरकार, एलियाह अपनी मंज़िल, होरेब पर्वत, पर पहुँचता है। और वहीं एक आश्चयर्यजनक बात होती है:
*“तब ख़ुदा ने कहा, "बाहर निकलकर पर्वत पर ख़ुदा की हाज़िरी में खड़े हो जा, क्योंकि ख़ुदा वहाँ से गुज़रने वाला हैं।" तब एक बड़ी और ज़बरदस्त आँधी चली, जिसने पहाड़ों को चीर डाला और चट्टानों को तोड़ डाला; लेकिन ख़ुदा आँधी में नहीं था। आँधी के बाद भूकंप आया, पर ख़ुदा भूकंप में भी नहीं था। फ़िर भूकंप के बाद आग आई, लेकिन ख़ुदा आग में भी नहीं था। और आग के बाद एक धीमी, कोमल फुसफुसाहट सुनाई दी। जब एलिय्याह ने उसे सुना, तो उसने अपना लबादा अपने चेहरे पर डाल लिया और गुफ़ा के मुँह पर आकर खड़ा हो गया। तब एक आवाज़ आई, "एलिय्याह, तू यहाँ क्या कर रहा हैं?" — १ राजा १९:११–१३
मुझे इस कहानी की सबसे ख़ूबसूरत बात यह लगती है कि ख़ुदा ने अपने आपको एलिय्याह पर ऐसे वक़्त में ज़ाहिर किया, जब वह अब भी बेहद टूटा हुआ था। मायूस, लंबे सफ़र से आकर थका हुआ और पूरी तरह तन्हा।
कई बार हम सोचते हैं कि ख़ुदा से कुछ पाने के लिए हमें हर चीज़ को बिल्कुल सही बनाना होगा, जिसके लिए एक "पाक" माहौल, सही मन की हालत और मज़बूत ईमान की ज़रूरत होगी, तभी हम ख़ुदा को काम करते हुए देख पाएँगे।
लेकिन यहाँ हम देखते हैं कि ख़ुदा एक ऐसे इंसान के क़रीब आता हैं, जो टूटा हुआ है और संघर्ष कर रहा है। वह अपने आपको उस वक़्त ज़ाहिर करता हैं, जब एलिय्याह सबसे ज़्यादा कमज़ोर था, जब उसकी सारी दीवारें गिर चुकी थीं और उसकी ख़ुद की कोई योजना नहीं बची थी। उसी मुक़म्मल समर्पण की हालत में ख़ुदा उसके क़रीब आता हैं और एक व्यक्तिगत सवाल पूछता हैं, *"एलिय्याह, तू यहाँ क्या कर रहा हैं?"
फ़िर जब एलिय्याह अपने दिल की सारी बातें ख़ुदा के सामने उँडेल देता हैं, तब ख़ुदा उसे उसके सफ़र के अगले हिस्से के लिए साफ़ और व्यवहारिक हिदायतें देता हैं।
अब एलिय्याह का तन्हाई का वक़्त ख़त्म होने वाला था। यह एक ऐसा दौर था जिसकी उसे सख़्त ज़रूरत थी, लेकिन ख़ुदा का इरादा कभी भी यह नहीं था कि एलिय्याह या हम हमेशा तन्हाई में ही रहें। आख़िरकार, हमें दूसरे विश्वासियों के साथ संगति में जीने और इबादत करने के लिए बुलाया गया है (इब्रानियों १०:२४)।
इस हफ़्ते का यह सफ़र काफ़ी गहरा और अहम रहा है। मैं जानना चाहूगी कि इसने आपकी ज़िंदगी पर क्या असर डाला या आपकी किस तरह मदद की?
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