ख़ुदा के पीछे चलने का मतलब है, उस पर भरोसा रखना। तब भी जब उसके तरीक़े समझ न आए
मैं अक्सर सोचता हूँ कि जब नामान यरदन नदी की तरफ़ जा रहा था, तो उसके मन में क्या चल रहा होगा।
उस नदी का पानी कोई ख़ास नहीं था। बल्कि यरदन नदी के कुछ हिस्से कीचड़ से भरे हुए और बहुत ही गंदे थे। वह ताक़तवर फ़ौजी सरदार एक ऐसी नदी में खड़ा था जिससे शायद बदबू भी आती थी और चारों तरफ़ लोग उसे देख रहे थे। फ़िर भी ख़ुदा ने उससे कहा कि वह उसमें सात बार डुबकी लगाए।
मैं सोच सकता हूँ कि उस वक़्त उसके मन में कितने ख़याल चल रहे होंगे।“कहीं इससे मैं और भी बीमार न हो जाऊँ!”“यह तो बिल्कुल बेवकूफ़ी है!”“अगर इससे कुछ भी न हुआ तो?”“लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे?”
फ़रमाबरदारी अक्सर ऐसी ही असहज महसूस होती है। ख़ुदा की हिदायतें हमेशा हमारी उम्मीदों के मुताबिक़ नहीं होतीं। कई बार वे हमारे घमंड, हमारी इज़्ज़त और हर बात को अपने क़ाबू में रखने की चाह को चुनौती देती हैं।
लेकिन आख़िरकार नामान ने फ़रमाबरदारी को चुना। और फ़रमाबरदारी के लिए पूरी तरह समर्पण करना ज़रूरी होता है। नीतिवचन की क़िताब में लिखा है:
*“तू अपने दिल से ख़ुदा पर भरोसा कर और अपनी समझ पर इत्मिनान न कर।” - नीतिवचन ३:५
ख़ुदा के पीछे चलने का मतलब यह है कि हम उस पर भरोसा रखें, तब भी जब हम उसकी राह या उसके काम करने के तरीक़े को पूरी तरह न समझ पाएँ। इसका मतलब यह है कि हम अपने पसंदीदा हलों को छोड़ दें और उसकी बुद्धि को अपनाएँ।
नामान को अपनी इज़्ज़त, अपना घमंड और अपनी उम्मीदों को छोड़ना पड़ा। तभी वह शिफ़ा का अनुभव कर सका। और उसने सचमुच शिफ़ा पाई!
हमारे साथ भी ऐसा ही होता है। कई बार सबसे बड़े चमत्कार मामूली सी फ़रमाबरदारी के दूसरी तरफ़ हमारा इंतज़ार कर रहे होते हैं। फ़रमाबरदारी का सफ़र शायद कभी शानदार न लगे, लेकिन उसमें हमेशा ताक़त होती है।
ख़ुदा हमसे यह नहीं चाहता कि हम हर बात को पूरी तरह समझ लें। वह सिर्फ़ इतना चाहता है कि हम उस पर इतना भरोसा करें कि उसके पीछे चलें।