परेशानियाँ मौजूद हैं, लेकिन जब परेशानियाँ सामने आती हैं, तब आप कहाँ जाते हैं?
आज आपका दिन कैसे शुरू हुआ?
आज सुबह ऐसा लगा, जैसे हर छोटी बात मेरे ख़िलाफ़ हो गई हो। मुझे बिस्तर छोड़ना भी मुश्किल लग रहा था। रात को मैं फ़ोन चार्ज करना भूल गया था। वाय-फ़ाय ने भी साथ छोड़ दिया। और ऊपर से घर में कॉफ़ी भी ख़त्म हो चुकी थी। यह सब कुछ सुबह ९ बजे से पहले ही हो गया था!
कुछ दिनों में परेशानियाँ धीरे-धीरे मेरे अंदर जगह बना लेती है। और यह एक लहर की तरह अचानक हमारी ज़िंदगी में दाख़िल हो जाती है।
अक्सर इसकी शुरुआत छोटी-छोटी बातों से होती है। हम ट्रैफ़िक में अटक जातें है। योजनाएँ बदल देते हैं। ख़बरें दिल पर बोझ डाल देती हैं। घर में कुछ ज़्यादा ही शोर होता है। और देखते ही देखते हमे एहसास होता है कि हमारे अंदर कुछ और ही चल रहा है। मानो जैसे परेशानी अंदर से धीरे-धीरे बढ़ रही है।
अगर मैं सच कहूँ, तो मायूसी सिर्फ़ हालात की वजह से नहीं होती। इसका रिश्ता इस बात से भी है कि मैं हर चीज़ अपने क़ाबू में रखना चाहता हूँ। जब ज़िंदगी मेरी योजनाओं के मुताबिक़ नहीं चलती, तब मेरे अंदर बेचैनी बढ़ने लगती है। मेरा सब्र कम होने लगता है। मेरी सोच सीमित हो जाती है। मेरा सुक़ून खो जाता है। और मेरा ईमान कमज़ोर पड़ने लगता है।
यीशु मसीह ने कभी यह वादा नहीं किया कि ज़िंदगी हमेशा आसान होगी। बल्कि उसने हमें पहले ही बता दिया था कि इस दुनिया में तकलीफ़ें, दबाव और मायूसियाँ होंगी। लेकिन यीशु मसीह ने हमें मायूसी से कहीं बढ़कर एक चीज़ दी है और वह है उसका सुक़ून।
*"मैं ने तुम को इस लिए यह बात बताई ताकि तुम मुझ में सलामती पाओ। दुनिया में तुम मुसीबतों से होकर गुज़रोगे। लेकिन हौसला रखो, मैंने दुनिया पर जीत पाई हैं।" - यूहन्ना १६:३३
सवाल यह नहीं है कि परेशानियाँ मौजूद हैं या नहीं, लेकिन जब परेशानियाँ सामने आती हैं, तब आप कहाँ जाते हैं।
चुनाव आपका हैं, आप परेशानी में बैठे रह सकते हैं और उसे बढ़ने दे सकते हैं या उसे यीशु मसीह के पास लेकर जा सकते हैं।
बीतें कुछ सालों में मैंने एक अहम बात सीखी है: परेशानी हक़ीक़त में रूहानी बढ़ोतरी का एक दरवाज़ा बन सकती है।
जब आपका सब्र अपनी आख़री हद तक पहुँच जाता है, तो वही पल, ख़ुदा पर और गहरे भरोसे की शुरुआत बन सकता है।
इसलिए आज परेशानी से लड़ने के बजाय, उसे उस ख़ुदा के पास ले आओ जिसने पहले ही दुनिया पर जीत पाई है।