भोर को यीशु उठा और एक सुनसान जगह पर जाकर दुआ करने लगा।
इस हफ़्ते हम इस बात पर ग़ौर कर रहे हैं कि दाऊद ने अपनी ज़िंदगी के सबसे मुश्किल दौर से गुज़रतें हुए, ख़ुदा में कैसे ताक़त पाई। (१ शमूएल ३०:६)
आज की अहम बात है: शिकायतों से निकलकर ख़ामोशी की तरफ़ आए।
इसका मतलब यह नहीं कि आप चुपचाप सब कुछ अपने अंदर दबाकर रखें या अपने ग़म किसी से बाँटें ही नहीं। इस हफ़्ते की शुरुआत में हमने इस बात पर बातचीत की थी कि अपने जज़्बात ज़ाहिर करना कितना ज़रूरी है। लेकिन मेरा मतलब यह है कि तन्हाई और ख़ामोशी में ख़ुदा की तलाश करना भी उतना ही ज़रूरी है।
दाऊद यह बात अच्छी तरह जानता था। इसलिए वह भजन संहिता ६३ में लिखता है:
*"ऐ ख़ुदा, तू मेरा ख़ुदा है। मैं सुबह-सवेरे तुझे ढूँढ़ूँगा। मेरी रूह को तेरी प्यास है। मेरा जिस्म तेरे लिए तरसता है, ऐसी सूखी और प्यासी ज़मीन में जहाँ पानी नहीं।" – भजन संहिता ६३:१
और इसी भजन में आगे वह कहता है:
*"जब मैं अपने बिस्तर पर तुझे याद करता हूँ, तो रात के पहरों में तुझ पर ग़ौर करता रहता हूँ।" – भजन संहिता ६३:६
हम अपने चमत्कार के प्रोत्साहनों में यह बात कई बार कह चुके हैं, लेकिन इसे जितनी बार दोहराएँ, कम है: ख़ामोशी और तन्हाई में ख़ुदा के साथ वक़्त बिताना अपनी ज़िंदगी की प्राथमिकता होनी चाहिए।
सिर्फ़ दाऊद ने ही ऐसा नहीं किया, बल्कि यीशु मसीह ने भी किया।
*”भोर को यीशु उठा और एक सुनसान जगह पर जाकर दुआ करने लगा।” – मरकुस १:३५
अगर यीशु मसीह को ख़ुदा के साथ तन्हाई और ख़ामोशी में वक़्त बिताने की ज़रूरत थी, तो यक़ीनन आपको भी है! 😉
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