मैं दिन में सात बार तेरी इबादत करता हूँ, क्योंकि तेरे रास्ते सच्चे और रास्त हैं।
इस हफ़्ते हम इस बात पर ग़ौर कर रहे हैं कि दाऊद ने अपनी ज़िंदगी के सबसे मुश्किल दौर से गुज़रतें हुए, ख़ुदा में कैसे ताक़त पाई। (१ शमूएल ३०:६)
हम जानते हैं कि दाऊद बेहतर समझता था कि ख़ुदा की इबादत करना कितना ज़रूरी है। भजन संहिता ११९:१६४ में वह लिखता है,
"मैं दिन में सात बार तेरी इबादत करता हूँ, क्योंकि तेरे रास्ते सच्चे और रास्त हैं।”
मैं अक्सर सोचता हूँ कि दाऊद का ख़ुदा की इबादत करने का तरीका कैसा होता होगा। क्या वह ऊँचे आवाज़ से वीणा बजाते हुए गाता होगा? या फ़िर जिस तरह वह सन्दूक़ के सामने नाचता था (२ शमूएल ६:१४) वैसे ही अपने कमरे में भी पूरे दिल से नाचता होगा?
हालाँकि मैं एक आराधना अगुवा हूँ, लेकिन हैरानी की बात यह है कि ख़ुदा की इबादत करने की मेरी सबसे पसंदीदा जगह कोई मंच या स्टूडियो नहीं है। वह मेरी कार है। मुझे अकेले ड्राइव पर जाना, कार के स्पीकर्स की आवाज़ तेज़ करना और अपने पसंदीदा इबादत के गीत पूरे दिल से गाना बहुत अच्छा लगता है। तो वही छोटी-सी जगह मेरे लिए एक पाक इबादतगाह बन जाती है।
मैं ऐसा सिर्फ़ तब नहीं करता, जब मैं ख़ुश होता हूँ या मेरा दिल चाहता हैं कि ख़ुदा की इबादत करें। मैंने यह आदत ख़ास तौर पर उन दिनों में डाली है, जब मैं मायूस या परेशान होता हूँ। शुरुआत में ऐसा लग सकता है कि जिन अल्फ़ाज़ो को मैं गा रहा हूँ, मेरा दिल उन्हें महसूस नहीं कर रहा। लेकिन मैंने सीखा है कि ख़ुदा की इबादत माहौल को बदल देती है। और जब मैं इबादत करने का फ़ैसला करता हूँ, तो धीरे धीरे मेरा दिल और मेरी रूह भी उसी के साथ जुड़ जाते हैं।
दाऊद इस बात को बहुत ख़ूबसूरती से दिखाता है, जब वह अपने ही दिल से कहता है:
"ऐ मेरे मन, ख़ुदावंद को मुबारक़ कह और उसकी किसी भी नेमत को न भूलना।" - भजन संहिता १०३:२
आज की अहम बात यह है कि शिकायतों से निकलकर ख़ुदा की इबादत करें।
दाऊद जानता था कि इबादत सिर्फ़ दिल का एक एहसास नहीं, बल्कि एक रूहानी अनुशासन है। इबादत सिर्फ़ एक जज़्बा नहीं, बल्कि एक फ़ैसला है। गाना किसी एहसास का नतीजा नहीं, बल्कि ईमान से उठाया गया एक क़दम है।
आज दाऊद की तरह अपने ही दिल से कहें कि वह ख़ुदा की इबादत करे। चाहे आपका मन करे या न करे। मैं यक़ीन के साथ कह सकता हूँ कि आपके अंदर कुछ न कुछ ज़रूर बदल जाएगा।