ख़ुदा की रहमतें हर सुबह नई होती है।
क्या दिन के आख़िर में कभी आपको ऐसा लगता है कि बस किसी तरह आज का दिन गुज़र गया?
मुझे कभी कभी ऐसा महसूस होता है। ऐसे समय मैं विलापगीत ३:२२-२३ HINOVBSI की यह आयत याद करती हूँ।
*"ख़ुदावंद की रहमतों की वजह से हम मिट नहीं गए, क्योंकि उसकी रहमतें कभी ख़त्म नहीं होती। वे हर सुबह नई होती हैं। तेरी वफ़ादारी अज़ीम है।"
ख़ुदा हर सुबह हमें नई रहमत बख़्शता है।
तो फ़िर आज के बोझ का क्या?
सबसे पहले, हर सुबह मिलने वाली यह नई रहमत हमें याद दिलाती है कि अगर किसी दिन को किसी तरह गुज़ारना पड़ा, तो हिम्मत हारने की ज़रूरत नहीं है। कई दिन हमें थका हुआ, टूटा हुआ और बोझिल छोड़ जाते हैं। और यह ठीक है।
बीते हुए दिन का हर बोझ यीशु मसीह के हवाले कर दो। (१ पतरस ५:७) वह उसे आपसे कहीं बेहतर संभाल सकता है। उस दिन के लिए जितनी रहमत की ज़रूरत थी, उतनी ख़ुदा ने दी। और कल सुबह वह फ़िर नई रहमत देगा।
दूसरी बात, हम आज की चुनौतियों का सामना कल की रहमत के सहारे नहीं कर सकते। हमें हर दिन ख़ुदा की नई रहमत क़बूल करनी चाहिए।
आयत यह नहीं कहती कि उसकी रहमत हर साल या हर महीने नई होती है। वह कहती है कि हर सुबह नई होती है, क्योंकि ख़ुदा जानता है कि एक समय में हम एक ही दिन का बोझ उठा सकते हैं। वह भविष्य और पूरी तस्वीर देखता है, लेकिन चाहता है कि हम आज के दिन पर ध्यान दें और बाकी सब कुछ उस पर छोड़ दें।
हर दिन दुआ में ख़ुदा के पास आओ और उसका सुक़ून, मोहब्बत और रहनुमाई को नए सिरे से क़बूल करों।
‘चमत्कार हर दिन’ के प्रोस्ताहन पढ़ने से आपको एक बेहतरीन शुरुआत मिलेगी।
अगर आप किसी और को भी हर दिन हौसला देना चाहते हैं, तो यह संदेश उसके साथ ज़रूर साझा करें। हो सकता है उसे भी आज यह याद दिलाने की ज़रूरत हो कि ख़ुदा की रहमत उसके लिए भी हर सुबह नई होती है।