तब मैं तुम्हें नया दिल बख़्शकर तुममें नई रूह डाल दूँगा।
क्या आपने कभी 'पत्थर का दिल' यह कहावत सुनी है?
इसका इस्तेमाल ऐसे इंसान के लिए किया जाता है, जिसका दिल सख़्त हो गया हो, जिस पर दूसरों के दर्द और जज़्बात का कोई असर नही होता हो।
क्या आप किसी ऐसे इंसान को जानते हैं? मैं जानती हूँ... वह मैं ख़ुद हूँ। 🫢
वैसे पूरी तरह नहीं, मैं अपने आपको बे-रहम या बे-दिल नहीं कहूँगी। लेकिन मेरा मतलब यह है कि हम सबके दिल कभी न कभी सख़्त हो जाते हैं।
ऐसा लगता है कि इस दुनिया में रहते हुए अपने दिल को सख़्त होने से बचाना लगभग नामुमक़िन है।
हम सभी ने कभी न कभी दिल टूटने या दर्द का अनुभव किया है। शायद किसी ने आपका भरोसा तोड़ा हो या आपको धोखा दिया हो। हो सकता है आपको तंग किया गया हो या आपके साथ भेदभाव हुआ हो। शायद आपको ठुकराया गया हो या आपकी बेइज़्ज़ती की गई हो। हमारे चारों ओर दिखाई देने वाले दर्द और तकलीफ़ की तो बात ही अलग है। हर दिन हम नाइंसाफ़ी, बीमारी, ग़रीबी और ज़बरदस्ती को अपनी आँखों से देखतें है।
असल मुद्दा यह है कि हमें इसका एहसास भी नहीं होता, और हम जाने-अनजाने ख़ुद को और अपने दिल को बचाने के लिए उसे सख़्त बना लेते हैं।
लेकिन ख़ुदा ने हमारे लिए इससे कहीं बेहतर रास्ता रखा है:
*"मैं तुम्हे नया दिल दूँगा और तुम्हारे अंदर नई रूह डालूँगा। मैं तुम्हारा पत्थर का दिल निकालकर आपको मांस का दिल दूँगा।" - यहेज़केल ३६:२६
अपने दिल को दर्द से बचाने के लिए उसे सख़्त बनाने के बजाय, ख़ुदा चाहता है कि आपका दिल ज़िंदा रहे, जो इस दुनिया के लिए उसकी मोहब्बत और रहम से धड़कता रहे।
और जब भी आपको महसूस हो कि आपके दिल का कोई हिस्सा फ़िर से पत्थर सा हो गया है, तो आप बस ख़ुदा के पास आओ। वह उसे बदलकर आपको फ़िर से एक नया और सेहतमंद दिल देगा।
सिर्फ़ नया दिल ही नहीं, ख़ुदा आपको नई रूह भी देना चाहता है।
*"क्योंकि ख़ुदा ने हमें डर की रूह नहीं, बल्कि सामर्थ, मोहब्बत और सब्र की रूह दी है।" - २ तीमुथियुस १:७
ज़रा सोचें, पत्थर के दिल और डर की रूह के बजाय, मांस का दिल और मोहब्बत व सामर्थ से भरी नई रूह कितनी बेहतर है?
आज अपने सारे दर्द और डर ख़ुदा को सौंपकर उसे अपने दिल और अपनी रूह के अंदर से नया करने दे।