ख़ुदा तूफ़ानों के बीच हमारे साथ चलता है।
हम प्रेरितों के काम की क़िताब के अपने सफ़र के लगभग आख़री चमत्कार के प्रोस्ताहन पर पहुँच चुके हैं। लेकिन आख़िर में भी कहानी में कई आश्चर्यचकित मोड़ और घटनाएँ सामने आती रहती हैं।
प्रेरितों के काम, अध्याय २७ में पौलुस को एक क़ैदी के रूप में रोम ले जाया जाता है। हालाँकि रोम जाना ख़ुदा की योजना थी, जैसा कि उसने प्रेरितों के काम २३:११ में साफ़ कहा था, लेकिन यह सफ़र बिल्कुल भी आसान नहीं था।
जल्द ही जहाज़ एक ख़तरनाक तूफ़ान में फँस जाता है। यह तूफ़ान, जिसे अक्सर यूरोक्लिडन कहा जाता है, यह इतना ख़तरनाक या डरावना होता है कि कई दिनों तक न सूरज नज़र आता है, न सितारे। तूफ़ान की वजह से जहाज़ इधर-उधर हिलता रहता है और उसमें सवार लोगों की बचने की सारी उम्मीद टूटने लगती है।
इसी गड़बड़ी के बीच पौलुस खड़ा होता है। वह बताता है कि ख़ुदा के एक फ़रिश्ते ने उसे बताया था कि जहाज़ पर कोई भी नहीं मरेगा। जहाज़ टूट जाएगा, लेकिन लोग बचा लिए जाएँगे। पौलुस कहता है, “इसलिए हिम्मत रखो! क्योंकि मुझे ख़ुदा पर भरोसा है। जैसा उसने कहा है, वैसा ही होगा।” (प्रेरितों के काम २७:२५)
पौलुस ख़ुद क़ैदी था, फ़िर भी वह उस जहाज़ पर उम्मीद का अगुआ बना। जहाँ तजुर्बेकार नाविक घबरा जातें हैं, वहाँ वह भरोसा दिखाता है।
हर इंसान अपनी ज़िंदगी में तूफ़ानों से गुज़रता है, बेयक़ीनी, नुक़सान, तनाव या डर के हालात। हम अक्सर दुआ करते हैं कि ख़ुदा अभी के अभी तूफ़ान को रोक दे। लेकिन इस अध्याय में हम एक अलग सच्चाई देखते हैं: ख़ुदा सिर्फ़ तूफ़ान को थमाने वाला ही नहीं, बल्कि तूफ़ानों के बीच हमारे साथ चलता है।
तूफ़ान तुरंत ख़त्म नहीं होता। जहाज़ टूट भी जाता है। लेकिन ख़ुदा अपना वादा पूरा करता है, सब लोग बच जाते हैं।
उसकी वफ़ादारी का मतलब यह नहीं कि सब कुछ आसान हो जाए, बल्कि यह है कि वह हमें मुश्किल हालात से गुज़ारतें हुए भी महफूज़ रखता है।
अगर आप इस वक़्त किसी तूफ़ान से गुज़र रहे हैं, तो मैं आपसे दो सवाल पूछना चाहता हूँ:
- ख़ुदा के कौन-से वादे मुझे मज़बूती से थामे रखते हैं?
- आप कैसे, पौलुस की तरह, डरने वालों के बीच उम्मीद की रोशनी बन सकते हैं?