इंसानी सियासत भी ख़ुदा का मंसूबा नहीं रोक सकती।
क्या आपको कभी ऐसा लगता है कि आपकी ज़िंदगी आगे बढ़ ही नहीं रही है? मानो आप लंबे समय से एक ही जगह पर अटके हुए हैं? अगर हाँ, तो हिम्मत न हारना। ऐसा महसूस करने वाले आप पहले इंसान नहीं हैं।
पौलुस को जेल में दो साल बीत जाते हैं। इसके बाद फ़ेलिक्स की जगह फेस्तुस नया हाकिम बनता है। यहूदी रहनुमा फेस्तुस से गुज़ारिश करता हैं कि पौलुस को यरूशलेम भेज दिया जाए, क्योंकि वे रास्ते में उस पर घात लगाकर उसका क़त्ल करना चाहते थे। लूका लिखता है कि फेस्तुस “यहूदियों को ख़ुश करना चाहता था।” (प्रेरितों के काम २५:९)
पहली नज़र में यह बात मासूम-सी लगती है, है ना?
लेकिन इन अल्फ़ाज़ के पीछे एक गहरा तनाव छिपा है। रोमी हाकिम होने के नाते फेस्तुस की ज़िम्मेदारी थी कि यहूदिया में अमन बनाए रखे। वह जानता था कि पौलुस पर लगाए गए इल्ज़ाम कमज़ोर हैं और हक़ीक़त में वह बेक़सूर था। फ़िर भी उसके ज़हन में उसे यरूशलेम भेजने का ख़याल क्यों आता है? शायद इसलिए कि उसके लिए सियासी सुकून, इंसाफ़ से ज़्यादा अहम था।
फेस्तुस की बुज़दिली के लिए उसका मज़ाक उडाना बहुत आसान है।
लेकिन क्या हम भी कई बार सच्चाई के बजाय सबको ख़ुश रखने की कोशिश नहीं करते? कितनी बार हम मतभेद या लड़ाई से बचने के लिए अपने पक्के यक़ीन को नज़रअंदाज़ कर लेते हैं?
पौलुस इस मसले का हिस्सा बनने से इनकार कर देता है। उसके ख़िलाफ़ इल्ज़ाम तो संजीदा थे, लेकिन साबित नहीं हुए थे। इसलिए वह सम्राट के सामने अपील करने का फ़ैसला करता है। ऐसा करके वह न केवल अपनी जान बचाता है, बल्कि नतीजे को पूरी तरह से बिना समझे, ख़ुदा के उस वादे की ओर भी बढ़ता है कि वह रोम में उसकी गवाही देगा।
कई साल पहले ख़ुदा ने कहा था कि पौलुस रोम में उसकी गवाही देगा। पौलुस के लिए जो रास्ता एक मजबूरी और बच निकलने का ज़रिया लगता था, वही ख़ुदा के वायदे के पूरा होने की ओर बढ़ने वाला एक अहम क़दम बन जाता है।
हम इसके ज़रिए क्या सीखते हैं? ख़ुदा का मंसूबा इंसानी ताक़त, सियासी चालों या सत्ता के खेलों से कभी नाकाम नहीं होता। वह एक मुक़दमे को मंज़िल तक पहुँचने का रास्ता बना देता है और देरी को अपनी योजना की तैयारी में बदल देता है।
ख़ुदा अपने मंसूबे को पूरा करने के लिए पेचीदा हालात और मुश्किल हालातों के ज़रिए भी काम करता है। कभी-कभी हमें यह समझने में वक़्त लगता है और कई बार हम इसे पूरी तरह कभी समझ ही नहीं पाते।
फ़िर भी, क्या आप उस पर भरोसा रखने के लिए तैयार हैं?