दुआ आख़री सहारा नहीं, बल्कि ख़ुदा का एक बेहद ताक़तवर ज़रिया है।
प्रेरितों के काम अध्याय १२ में हम पढ़ते हैं, राजा हेरोद ने कलीसिया के ख़िलाफ़ एक सुनियोजित हमला शुरू किया। याक़ूब को मार डाला गया और पतरस को क़ैदखाने में डाल दिया गया। हालात बेहद भयानक हो चुके थे।
कलीसिया जो कर सकती थी, उन्होंने वही किया, उन्होंने पूरे मन से दुआ की। इस बीच पतरस दो सैनिकों के बीच जंजीरों में जकड़ा हुआ था और कड़ी निगरानी में रखा गया था। इंसानी नज़रिए से देखा जाए तो उसका बच निकलना नामुमक़िन था। लेकिन आधी रात को एक फ़रिश्ता प्रकट हुआ। जंजीरें टूटकर गिर गईं, दरवाज़े अपने आप खुल गए और पतरस ऐसे बाहर निकल गया मानो वहाँ कोई दरवाज़ें ही नहीं थे।
उसके बाद क्या हुआ, यह चमत्कार की बात थी। जब वह उस घर के दरवाज़े पर पहुँचा जहाँ मसीही दुआ कर रहे थे और उसने दरवाज़ें पर दस्तक दी, तो पहले तो उन्होंने यक़ीन ही नहीं किया कि सचमुच पतरस बाहर खड़ा है।
वे उसकी आज़ादी के लिए दुआ तो कर रहे थे, लेकिन जब ख़ुदा ने हक़ीक़त में दुआ का जवाब दिया, तो वे खुल आश्चर्यचकित रह गए।
यह अध्याय कुछ अजीब-सा लगता है: याक़ूब को रिहाई नहीं मिली, लेकिन पतरस को मिल गई। क्यों? इसका जवाब हमें नहीं दिया गया। यह एक राज़ ही बना रहता है। ख़ुदा के तरीके और उसकी योजनाएँ हमेशा हमारी समझ में नहीं आतीं।
पतरस का जेल से छूटना बाइबल की मेरी सबसे पसंदीदा घटनाओं में से एक है। इसकी एक वजह यह भी है कि पतरस के छूटने से पहले याक़ूब नहीं बचा, उसे मार दिया गया था। क्या यह इंसाफ़ था? यह घटना हमें मजबूर करती है कि हम ख़ुदा पर तब भी भरोसा करना सीखें, जब ज़िंदगी दर्दभरी और नाइंसाफ़ लगती है। इस कहानी से हम जो सबक सीख सकते हैं, वे आज के चमत्कार प्रोत्साहन से कहीं ज़्यादा गहरे हैं। इसलिए मैंने इन्हें YouVersion Bible App पर एक विशेष बाइबल पढ़ने की योजना के रूप में तैयार किया है।
लेकिन एक बात बिल्कुल स्पष्ट है: दुआ सिर्फ़ आख़री सहारा नहीं, बल्कि ख़ुदा की योजना में एक बेहद ताक़तवर ज़रिया है।
अध्याय के अंत में हम पढ़ते हैं: *“बल्कि ख़ुदा का कलाम बढ़ता और फैलता गया।” (प्रेरितों के काम १२:२४) दुनिया का कोई भी राजा उसे रोक नहीं सकता।
प्रेरितों के काम अध्याय १२ हमें सिखाता है कि जब सभी दरवाज़े बंद दिखाई देते हैं, तब भी ख़ुदा सीमित नहीं होता। और दुआ के ज़रिए वह उन बातों को भी मुमक़िन कर सकता है जो हमारे लिए नामुमक़िन होती हैं।
यही बात मुझे सोचने पर मजबूर करती है, और मैं आपसे भी यही सवाल पूछना चाहता हूँ: क्या आप सचमुच उम्मीद रखते हैं कि ख़ुदा दख़लअंदाज़ी करेगा?