कोई भी ख़ुदा के फ़ज़्ल और रहमत की पहुँच से बाहर नहीं है।
आपकी ज़िंदगी में अब तक कौनसी नामुमक़िन घटना हुई है? या कौन-सा सबसे बड़ा बदलाव आया है? मेरी ज़िंदगी में, मैं एक साधारण पासबान के बेटे से एक मशहुर आराधना अगुवा बन गया।
लेकिन यह बदलाव भी शाऊल की ज़िंदगी में आए बदलाव के सामने बहुत मामूली सा लगता है, या यूँ कहें, पौलुस की ज़िंदगी में?
शाऊल एक पक्का इरादा रखने वाला और बेहरहमी से सताने वाला इंसान था। जेब में ख़त लिए हुए, वह डमस्कस की ओर रवाना होता है ताकि “यीशु मसीह” के अनुयायियों को गिरफ़्तार कर सके। उसे यक़ीन है कि वह ख़ुदा की सेवा कर रहा है। उसका जज़्बा सच्चा था, लेकिन तरीक़ा ग़लत।
जब वह रास्ते में ही था, तब आसमान से एक तेज़ रोशनी उस पर पड़ी और वह ज़मीन पर गिर पड़ा और एक आवाज़ आई: “शाऊल, शाऊल, तू मुझे क्यों सता रहा है?” (प्रेरितों के काम ९:४)
यह एक मुठभेड़ ही नहीं बल्कि प्रकटीकरण था। यीशु मसीह ज़िंदा हैं! और जो कोई उसकी कलीसिया पर ज़ुल्म करता है, वे उस पर भी ज़ुल्म करते हैं। उस तेज़ रोशनी ने शाऊल को अंधा कर दिया। जो इंसान दूसरों को सताने में ताक़तवर था, अब ख़ुद दूसरों पर निर्भर हो गया था। तीन दिनों तक वह अंधेरे में इंतज़ार करता रहा।
जब ख़ुदा ने हनन्याह को शाऊल के पास जाने का आदेश दिया, तब उसने स्वाभाविक रूप से विरोध किया। लेकिन ख़ुदा ने हनन्याह से कहा: “शाऊल मेरा चुना हुआ पात्र है।” (प्रेरितों के काम ९:१५)
यहाँ ख़ुदा का फ़ज़्ल ज़ाहिर हुआ। माफ़ी के साथ-साथ ख़ुदा ने, शाऊल को एक बिल्कुल नई बुलाहट दि। शाऊल, अब पौलुस बन गया। एक सतानेवाला, मसीह का चेला बन गया। यह इसलिए नहीं कि वह इसका हक़दार था, बल्कि इसलिए कि मसीह ने उसे अपने लिए चुन लिया।
प्रेरितों के काम अध्याय ९ हमें यह सच्चाई दिखाता है कि कोई भी इंसान ख़ुदा के फ़ज़्ल और रहमत की पहुँच से बाहर नहीं है। और यह बुलाहट की शुरुआत अक्सर समर्पण से होती है। कई बार हम दूसरों पर या स्वयं अपने ऊपर ऐसे ठप्पे लगा देते हैं जिन्हें ख़ुदा बहुत पहले ही तोड़ चुका होता है।
क्या आपकी ज़िंदगी में ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ अब भी गहरे बदलाव की ज़रूरत है? क्या ऐसे पहलू हैं जिन्हें आपको ख़ुदा के हवाले करना है?
आओ मिलकर दुआ करें:
"ऐ आसमानी पिता, मेरा दिल तेरे हाथों में ले और जहाँ मैं ग़लत हूँ वहाँ मुझे बदल दे। मेरी ज़िंदगी को तेरे फ़ज़्ल, तेरी रहमत की एक ख़ूबसूरत गवाही बना। यीशु मसीह के नाम मे, आमीन।"