क्या लोग बता सकते हैं कि आप एक मसीही हैं?
शायद आपने इसे सोशल मीडिया पर देखा होगा, लेकिन कुछ महीने पहले एक सभा, जहाँ कॅमरॉन आराधना की अगुवाई कर रहा था, तभी कुछ धार्मिक कट्टरपंथियों ने हमला कर दिया था। शुक्र है कि पुलिस वक़्त पर पहुँच गई और हमें आराधना सभा को पूरा करने दिया। लेकिन इस घटना ने मुझे याद दिलाया कि हालात बिल्कुल अलग भी हो सकते थे।
प्रेरितों के काम अध्याय ३ में हुए चमत्कार और प्रभावशाली प्रचार के बाद, पतरस और यूहन्ना को गिरफ़्तार कर लिया गया।
धार्मिक अगुवों की नाराज़गी महज़ उस लंगड़े इंसान की शिफ़ा की वजह नहीं थी, बल्कि इसलिए थी कि जिस यीशु मसीह के नाम को उन्होंने क्रूस के ज़रिये हमेशा के लिए ख़ामोश कर दिया था, वही नाम अब फ़िर से यरूशलेम की गलियों में गूँज रहा था।
अगले दिन, पतरस और यूहन्ना को महासभा के उसी अदालत में खड़ा किया जहाँ कुछ ही समय पहले, धार्मिक अगुवों ने यीशु मसीह को दोषी ठहराया था।
पतरस, को महासभा के उसी अदालत में खड़ा किया और वह बड़ी हिम्मत, दिलेरी और बिना किसी झिझक के एलान करता है कि यह चंगाई, उसी यीशु मसीह के नाम और सामर्थ के ज़रिये मिली है, जिसे उन्होंने क्रूस पर चढ़ाया था, परन्तु जिसे ख़ुदा ने मरे हुओं में से जिलाया। धार्मिक अगुवों को सबसे अधिक हैरानी इस बात की होती है कि पतरस और यूहन्ना “न तो बड़े विद्वान थे और न ही समाज में किसी अहम पद या प्रतिष्ठा वाले व्यक्ति”। फ़िर भी आख़िर में उन्होंने एक बात को पहचाना कि पतरस और यूहन्ना यीशु मसीह के साथ रहे है। (प्रेरितों के काम ४:१३)
रिहा होने के बाद, वे न तो शिकायत करते हैं और न ही पीछे हटते हैं, बल्कि वे अपने विश्वासियों के पास लौटते हैं। वे एकजुट होकर, अपनी हिफ़ाज़त या आराम के लिए नहीं, बल्कि अधिक हिम्मत और साहस के लिए दुआ करते हैं। तब एक बार फ़िर वे पवित्र आत्मा से भर जाते हैं और ख़ुदा के कलाम को पहले से भी ज़्यादा सामर्थ और निर्भीडता के साथ सुनाते हैं।
विरोध, ख़ुदा की ग़ैर-मौजूदगी का प्रमाण नहीं होता। अक़्सर दबाव और कठिनाइयों के बीच ही ईमान की असलियत सामने आती है। पतरस और यूहन्ना की हिम्मत उनके अपने आत्म-विश्वास से नहीं, बल्कि यीशु मसीह के साथ उनके गहरे रिश्ते से निकलती थी।
शायद आप भी ऐसा दबाव महसूस करते होंगे, जब आपका ईमान सबके सामने उजागर होता है। सवाल यह नहीं है कि दबाव आएगा या नहीं, बल्कि यह है कि हम अपनी ताक़त कहाँ से पाते है। क्या लोग हमें देखकर पहचान सकते हैं कि सच में हम यीशु मसीह के चेले हैं?
क्या मेरी बातों और मेरे रवैये से यह साफ़ ज़ाहिर होता है कि मैं यीशु मसीह के वचनों के मुताबिक़ चलती हूँ?