क्या शक़ आपको ईमान के साथ आगे बढ़ने से रोक रहा हैं?
क्या आप कभी ऐसा महसूस करते हैं कि आप तूफ़ान में फँसे हुए हैं? ज़िंदगी की उठती-गिरती लहरों को सँभालने की कोशिश कर रहे हैं? चाहे ये तूफ़ान असली हों या ज़िंदगी की मुश्किलें, ये हमें डर, बे-यक़ीनी और कमज़ोरी का एहसास दिला सकते हैं।
लेकिन अच्छी ख़बर यह है, आप उस तूफ़ान में अकेले नहीं हैं!
जब चेलें नाव में, समुंदर के बीच, तेज़ हवा और उठती लहरों से जूझते हुए, थके हुए और बेचैन थे। हौले हौले, सूरज ढ़लने लगता है और तूफ़ान और भी तेज़ हो जाता है। जब वे डर, अविश्वास और कमज़ोरी से घिरे हुए थे, तब उसी तूफ़ान के बीच, यीशु मसीह पानी पर चलते हुए उनकी तरफ़ आता हैं। (मत्ती १४:२४-२५)। यीशु मसीह ने उनसे कहा, “हौसला रखो! मैं ही हूँ। डरो मत।”(आयत २७)।
पतरस, जो हमेशा दिलेर और जल्दबाज़ था, जवाब देता है: “‘ऐ ख़ुदावंद, अगर तू ही है, तो मुझे हुक़्म दे कि मैं पानी पर चलकर तेरे पास आऊँ (आयत २८)।’”
यीशु मसीह ने उसे न्योता दिया।
पतरस, नाव से बाहर क़दम रखता है और उसी पल में नामुमक़िन काम, मुमक़िन हो जाता है। वह पानी पर चलते हुए, यीशु मसीह की तरफ़ बढ़ता है! सोचिए उसकी ख़ुशी और डर, वो एहसास कि वह कुछ ऐसा कर रहा है जो किसी और ने करने की हिम्मत नहीं की होगी।
लेकिन जब पतरस, हवा और लहरों पर अपनी नज़र लगाता है, तब ख़ौफ़ उसके दिल में घर करने लगता है और वह डूबने लगता है।
”जब उसने तूफ़ान को देखा, तब वह डर गया और डूबने लगा, और ज़ोर से फ़रियाद करने लगा, “ऐ ख़ुदावंद, मुझे बचा!”’ - मत्ती १४:३०
यह पल एक गहरी सच्चाई को उजागर करता है: अक्सर चमत्कार, ईमान और डर के बीच चल रही कशमकश में जन्म लेता हैं। जब आप हिम्मत के साथ आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं, तब डर आपकी नज़र उस सामर्थ से हटा देता है जो मुमक़िन को जन्म दे सकती है।
“‘फ़ौरन यीशु ने हाथ बढ़ाकर उसे थाम लिया और कहा, “ऐ कम ईमान वाले, तू शक़ में क्यों पड़ गया?’” - मत्ती १४:३१
यीशु मसीह ख़ामोश था, डटा हुआ था और क़ाबू में था। वह पतरस को सख़्ती से नहीं डाँटता है; बस उसे यक़ीन करने के लिए बुलाता है।
ईमान और शक़ एक साथ मौजूद होतें हैं। ईमान के साथ आगे बढ़ते हुए भी डर महसूस होना एक स्वाभाविक बात है। असली बात यह है कि हम अपनी नज़र उसी पर बनाए रखें जो हमें बचा सकता है।
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