क्या आप जानते हैं की अप कबसे ख़ुदा के ज़हन में रहे हैं?
इस्राएल के लोग मिस्र से निकलने के कुछ ही समय बाद, मूसा को ख़ुदा से यह निर्देश मिला कि वह उसके लिए एक निवास स्थान बनाए (निर्गमन २५ से आगे पढ़ें)। इसे मिलाप का तंबू भी कहा जाता है, एक ऐसा चलता-फिरता ढांचा, जिसे वे जहाँ भी डेरा डालते, अपने शिविर के बीचों-बीच खड़ा करते थे।
इन निर्देशों को पढ़ना लंबा और थोड़ा बोझिल सा लग सकता है, लेकिन इसके पीछे एक ख़ास वजह है; मिलाप के तंबू का लगभग हर पहलू यीशु मसीह की ओर इशारा करता है। मिसाल के तौर पर, उस तंबू का सिर्फ़ एक ही दरवाज़ा था और वह यहूदा के क़बीले की तरफ़ खुलता था, यह यीशु मसीह की ओर इशारा करता है, जो “यहूदा का सिंह” हैं और जो ख़ुदा तक पहुँचने का एकमात्र रास्ता हैं (यूहन्ना १४:६)।
और यह तो बस उन कई छिपे हुए पैग़ामों में से एक है, तंबू की पूरी बनावट, इस्तेमाल किए गए सामान और रंग, गिनतियाँ और नाप, सब कुछ गहरी निशानियों से भरा हुआ है, जो यीशु मसीह और उसकी हमारे लिए मोहब्बत की ओर इशारा करता है। आज के इस चमत्कार में यह सब पूरी तरह समेट पाना मुमक़िन नहीं है।
मगर मैं एक बहुत ही ख़ास बात ज़रूर बताना चाहता हूँ, जिसके बारे में बहुत से लोग नहीं जानते। लोगों को न सिर्फ़ तंबू बनाने के निर्देश दिए गए थे, बल्कि यह भी बताया गया था कि उसके चारों ओर कैसे डेरा डालना है। गिनती २ में हम पढ़ते हैं कि हर क़बीला कहाँ डेरा डालेगा और उनकी संख्या कितनी होगी। अगर आप इन संख्याओं को जोड़ें, तो पाएँगे कि हर दिशा का शिविर एक जैसा नहीं था, एक तरफ़ का हिस्सा काफी बड़ा था।
इस असंतुलन के पीछे एक गहरा राज़ था। यक़ीन मानिए, अगर आप गिनती २ के अनुसार इन शिविरों का नक्शा बनाएं, तो मानो उसका आकार एक… क्रूस जैसे बनता हो!! ✝️😱
यीशु मसीह की क्रूस पर क़ुर्बानी देने से कई सदियों पहले ही, उसकी उस अज़ीम क़ुर्बानी की झलक इस्राएल के लोगों के बीच नज़र आ रही थी।
क्या यह अद्भुत नहीं है? आप सदियों से उसके ज़हन में रहे हैं!