क्या आपको कभी लगता है कि ज़िंदगी ने आपके साथ नाइंसाफ़ी की है?
कभी-कभी मैं बाइबल के कुछ हिस्से पढ़ता हूँ और सोचता हूँ, “ख़ुदा, ये बात कुछ नाइंसाफ़ी सी लगती है।”
मिसाल के तौर पर, जब मूसा ने इस्राएलियों को मिस्र से बाहर निकाला, उसने ४० साल तक जंगल में उनकी रहनुमाई की, उनके लिए ख़ुदा से लगातार बात की, ख़ुदा की हर आज्ञा को पूरा किया और यह सब एक ज़िद्दी और एहसान-फ़रामोश लोगों का साथ निभाते हुए किया, फ़िर भी उसे वादा किए हुए देश में जाने की इजाज़त नहीं मिली। वह उसे सिर्फ़ दूर से देख सका (व्यवस्थाविवरण ३२:५०-५२ HINOVBSI)।
यह कौनसा इंसाफ़ है??
ऊपर-ऊपर से देखें तो यह इंसाफ़ नहीं लगता। लेकिन जब हम ध्यान देकर समझते हैं कि यह क्या दर्शाता है, तो यह एक गहरी और ख़ूबसूरत कहानी को उजागर करता है और वो है ख़ुदा की बड़ी दरियादिली।
मूसा व्यवस्था का प्रतीक है। वो वही था जिसने पत्थर की तख़्तियों पर लिखी व्यवस्था ख़ुदा से हासिल की (निर्गमन २४)। वह लोगों के लिए उसी व्यवस्था के लिए फ़ैसला लेने वाला बना और इसे अक्सर “मूसा की व्यवस्था” कहा जाता है।
मूसा का उत्तराधिकारी यहोशू में, यीशु मसीह की झलक दिखती हैं (इब्रानी ज़बान में उनके नाम भी एक जैसे हैं)। यहोशू ने व्यवस्था को ठुकराया नहीं, बल्कि उससे आगे बढ़ा, उसने क़ायदों से ज़्यादा ख़ुदा की मौजूदगी को चाहा। जब भी मूसा ख़ुदा से मिलने के बाद मिलाप के तंबू से बाहर आता, यहोशू वहीं ठहरता था (निर्गमन ३३:११)। वह ख़ुदा के दिल के क़रीब रहने वाला इंसान था।
लोगों को वादा किए हुए देश में ले जाने वाला मूसा नहीं, बल्कि यहोशू था। इससे यह साबित होता है कि व्यवस्था चाहे कितनी भी अच्छी और मज़बूत क्यों न हो, आख़िर में हमें मंज़िल तक नहीं पहुँचा सकती। वहाँ पहुँचना सिर्फ़ यहोशू के ज़रिए मुमक़िन था और हमारे लिए, यीशु मसीह के ज़रिए मुमक़िन है।
क्या मूसा को वादा किए हुए देश में जाने देना इंसाफ़ होता? नहीं। असल इंसाफ़ तो यह होता कि किसी को भी अंदर जाने की इजाज़त नही मिलती, क्योंकि सबने ग़ुनाह किया था।
मगर जैसे ही यहोशू का दौर आया, तो बात सिर्फ़ इंसाफ़ की नहीं रही। यहोशू के ज़रिए लोगों को उससे कहीं ज़्यादा मिला, जिसके वे कभी हक़दार भी नहीं थे।
यही बात आपके लिए भी सच है, यीशु मसीह आपके लिए यहोशू हैं। उसने व्यवस्था को पूरा किया, ताकि आप पवित्र आत्मा के वादे को हासिल कर सकें (मत्ती ५:१७ और गलातियों ३:१०-१४ HINOVBSI)।