क्या कभी आपको किसी ऐसे ग़लती के लिए सज़ा मिली है, जो आपने की ही नहीं?
क्या कभी आपको किसी ऐसे ग़लती के लिए सज़ा मिली है, जो आपने की ही नहीं? क्या कभी आपकी शख़्सियत को बेवजह बदनाम किया गया हैं, जबकि आप सही काम करने की कोशिश कर रहे थे? मेरे साथ ऐसा हुआ है, और मैं बता सकती हूँ कि यह बेहद दर्दनाक होता है।
यूसुफ़ इस एहसास को बहुत अच्छी तरह जानता था। उत्पत्ति ३९ में हम पढ़ते हैं कि कैसे वह एक ऐसे काम के लिए क़ैदख़ाने में डाला गया, जो उसने किया ही नहीं था।
क़ैदख़ाने में, यूसुफ़ की मुलाक़ात दो और क़ैदियों से होती है; फ़िरौन के बावर्ची और साक़ी से। दोनों ने फ़िरौन को नाराज़ किया था और उसकी सज़ा कांट रहे थे (उत्पत्ति ४०:१–२ HINOVBSI)।
दोनों क़ैदियों ने सपने देखे जिन्हें सिर्फ़ यूसुफ़ समझाता है। साक़ी के सपने का मतलब था कि वह तीन दिनों में फ़िर से अपनी जगह पर पुनर्स्थापित हो जाएगा, जबकि बावर्ची के सपने में चेतावनी थी कि तीन दिनों में फ़िरौन उसे सज़ा-ए-मौत देगा। दोनों सपने ठीक उसी तरह पूरे हुए जैसे यूसुफ़ ने समझाया था (उत्पत्ति ४० HINOVBSI)।
यह पूरी घटना हमें यीशु मसीह की तरफ़ इशारा करती है। यूसुफ़ की तरह, बेग़ुनाह होते हुए भी यीशु मसीह को सज़ा मिली और उसे सज़ा सुनाए जाते वक़्त दो मुजरिमों के बीच टँगाया गया।
इसी तरह क्रूस पर, यीशु मसीह के दोनों ओर लटके दो मुजरिमों ने उससे बातचीत की। एक ने उसका मज़ाक उड़ाया, जबकि दूसरे ने उसकी रहमत की गुज़ारिश की। जैसे बावर्ची और साक़ी के साथ हुआ था, वैसे ही यीशु मसीह ने ऐलान किया कि एक मुजरिम उद्धार पाएगा, लेकिन दूसरा ग़ुनाहगार ठहरेगा (लूका २३:३९–४३ HINOVBSI)।
कई साल बाद, यूसुफ़ को फ़िरौन के सपनों को समझाने का मौक़ा मिला और इसी वजह से वह क़ैदख़ाने से रिहा हुआ। उसकी ताबीर इतनी सही थी कि फ़िरौन ने उसे “ज़ाफ़नत-पानेह” नाम दिया, जिसका मतलब है “ख़ुदा बोलता है” (उत्पत्ति ४१ HINOVBSI)। इसका मतलब है “ख़ुदा का लफ्ज़” और आप जानते हैं कि और किसे “ख़ुदा का लफ्ज़” कहा गया है? जी हाँ, यीशु मसीह को (यूहन्ना १:१ HINOVBSI)।
ये सारी समानताएँ हमें याद दिलाती हैं कि यीशु मसीह की मौत कोई इत्तिफ़ाक़ नहीं थी। उसकी पूरी ज़िंदगी पहले से ही बयान की जा चुकी थी, कहानियों के ज़रिए, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाती रहीं हैं।
यही एक अद्भुत चमत्कार है!