यीशु मसीह की तरह, हमें भी तरोताज़ा होना चाहिए।
कल हमने इस बात पर ग़ौर किया कि एक ही दिन में यीशु मसीह ने कितना भारी दबाव सहा। आज हम यह देखेंगे कि उसने उन चुनौतियों का मुक़ाबला कैसे किया और हम उन सिद्धांतों को अपनी ज़िंदगी में कैसे लागू कर सकते हैं।
बड़े दबाव को सहने के लिए यीशु मसीह ने जो अहम काम किया, वह था विश्राम करना और अपने आसमानी पिता के साथ के रिश्ते को पहला स्थान देना। भीड़ के दबाव के बीच उसने अपने चेलों से कहा, *“तुम मेरे साथ किसी ख़ामोश जगह पर चल कर विश्राम करो।” (मरकुस ६:३१ HINOVBSI)
यीशु मसीह की तरह, हमें भी तरोताज़ा होना चाहिए। हमारे शरीर और रूह, दोनों की देखभाल करना ज़रूरी है।
इसका एक अहम हिस्सा है कि अपनी प्राथमिकताओं को सही क्रम में रखना चाहिए। और मुझे अक़सर यह देखकर आश्चर्य होता है कि कई महान मसीही अगुवे भी इसमें ग़लती कर बैठते हैं।
कभी-कभी लोग सोचते हैं कि उनका बुलावा या उनकी सेवा ही उनकी पहली प्राथमिकता है, लेकिन ख़ुदा इसे ऐसे नज़र से नहीं देखता है। चाहे आपकी कलीसिया कितनी भी बड़ी हो या आपकी सेवकाई कितनी भी प्रभावशाली हो, ज़िंदगी की सबसे अहम बात आपका व्यक्तिगत चाल-चलन और ख़ुदा के साथ आपका रिश्ता है। (लूका १०:४१–४२)।
उसके बाद, अगर आप शादीशुदा हैं, तो आपके जीवनसाथी और माता-पिता की भूमिका आती है। फ़िर अपने आसपास के लोगों के लिए एक सच्चा दोस्त बनना और आख़िर में आपका काम या सेवकाई।
यीशु मसीह ने भी अपनी ताक़त और प्राथमिकता ख़ुदा में ही पाईं। वह दुआ और तन्हाई के ज़रिए अपने आसमानी पिता से जुड़ा रहा। हलचल और अव्यवस्था के बीच भी उसने अलग होकर ख़ुदा की मौजूदगी को खोजने के लिए वक़्त निकाला:
*“उन्हें विदा करने के बाद वह पहाड़ पर अकेले में दुआ करने गया और रात तक वहाँ अकेला था।” — मत्ती १४:२३ HINOVBSI
जब हम मुश्क़िलों के बीच अपना ध्यान दोबारा ख़ुदा पर लगाते हैं, तब हमें नई ताक़त हासिल होती हैं। यीशु मसीह ने इसकी बेहतरीन मिसाल दी है और हम उसके उदाहरण का अनुसरण कर सकते हैं।
आओ, मिलकर दुआ करें।
ऐ आसमानी पिता, हमारी मदद कर कि हम अपनी ज़िंदगी में सही प्राथमिकताएँ तय करें और अपनी ताक़त तुझ में पाएँ। हमें सिखा कि हम अपनी भागदौड़ भरी ज़िंदगी के बीच, सही पाबंदियाँ और दायरें तय कर सके और तेरी मौजूदगी की तलाश करते रहे। शुक्रिया की, तू हमारी पनाह और बल हैं। यीशु मसीह के नाम में, आमीन।