ख़ुदा आपकी ज़रूरतों को देखता है।
क्या आप कभी फ़िक्र करते हैं? काम को लेकर, रहने की जगह या कपड़ों को लेकर?
ज़िंदगी में, कभी-न-कभी हम सब ऐसी चिंता करते हैं। लेकिन यीशु मसीह हमें ऐसी बातों की चिंता न करने के लिए हौसला देता है। अपनी सबसे मशहूर, पहाड़ी उपदेश में, वह हमसे कहता हैं:
*“इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ:अपनी ज़िंदगी की फ़िक्र न करे,कि तुम क्या खाओगे या क्या पीओगे;और न अपने जिस्म के बारे में कि क्या पहनोगे।क्या ज़िंदगी खाने से और जिस्म के लिबाज़ से बढ़कर नहीं है?आसमान के परिंदो को देखे;वे न बोते हैं, न काटते हैं और न कोठारों में जमा करते हैं;फ़िर भी तुम्हारा आसमानी पिता उन्हें खिलाता है।क्या तुम उनसे कई ज़्यादा क़ीमती नहीं है?क्या तुम में से कोई फ़िक्र करके,अपनी ज़िंदगी में एक घड़ी भी बढ़ा सकता है?और कपड़ों की फ़िक्र क्यों करते हो?मैदान के फूलों को देखे कि वे कैसे उगते हैं।वे न मेहनत करते हैं और न कताई करते हैं।फ़िर भी मैं तुमसे कहता हूँ कि,सुलैमान भी अपनी सारी शान-ओ-शौकत में,इनमें से किसी के समान न सजा था।अगर ख़ुदा मैदान की घास को जो आज हैऔर कल आग में झोंक दी जाती है ऐसा सजाता है,तो क्या वह तुम्हें और भी ज़्यादा न सजाएगा, हे अल्प-विश्वासियों?इसलिए फ़िक्र न करे और न कहे, ‘हम क्या खाएँगे?’ या ‘हम क्या पिएँगे?’ या ‘हम क्या पहनेंगे?’क्योंकि दुनयावी लोग इन सब बातों के पीछे लगें रहतें हैं,लेकिन तुम्हारा आसमानी पिता जानता है कि तुम्हे इन सब की ज़रूरत है।” — मत्ती ६:२५–३२ HINOVBSI
इस आयत में जो मुझे बार-बार सबसे ज़्यादा प्रभावित करता है, वह यह है कि यीशु मसीह हमें अपनी ज़रूरतों की ओर देखते रहने के लिए नहीं कहता। बल्कि वह साफ़ साफ़ कहता है, “परिंदों को देखे” या “फ़ुलों को देखे।”
क्यों? क्योंकि ये सब ख़ुदा के इंतज़ाम की याद दिलाते हैं।
यीशु मसीह इस बात का इनकार नहीं करता हैं कि ज़िंदगी की कई ज़रूरतें हैं और उनके बारे में फ़िक्र करना जायज़ हो सकता हैं, लेकिन वह हमें सिखाता हैं कि हमे उन बातों की फ़िक्र करने की ज़रुरत नहीं हैं क्योंकि ख़ुदा सब जानता है।
इसका मुख्य संदेश यही है कि ख़ुदा आपकी ज़रूरतों को देखता है, इसलिए आपको फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं है।
क्या आप आज कुछ वक़्त निकालकर ख़ुदा की बरकतों पर नज़र डालेंगे और उसका शुक्र अदा करेंगे?