आपके आँसू ख़ुदा के लिए सोने से भी ज़्यादा क़ीमती हैं।
आप रोने के बारे में कैसा महसूस करतें हैं? क्या आँसू आसानी से आ जाते हैं, या सिर्फ़ बहुत ही ख़ास पलों में? मेरे लिए तो महज़ कोई जज़्बाती फ़िल्म या कोई ख़ूबसूरत इबादत का गीत और मेरी आँखें पल भर में भर आती हैं। लेकिन मैं जानती हूँ कि यह हर किसी के साथ नहीं होता।
कुछ लोगों को रोना बहुत मुश्क़िल लगता है। और सच कहें तो, ख़ास तौर पर मर्दों के लिए अपने एहसासात ज़ाहिर करना आसान नहीं होता। यह और भी ज़्यादा तब होता है जब वे भारतीय “मर्दाना” रीतिरिवाजों में पले-बड़े होते हैं।
लड़कों को अक़सर यह कहते हुए बड़ा किया जाता है कि, “लड़के रोते नहीं हैं,” या “असली मर्द आँसू नहीं बहाते।” लेकिन महिलाओं के लिए भी, कई बार आँसुओं को बहाना मुश्क़िल लग सकता है।
ज़ैक की बीमारी से भरी ज़िंदगी का सफ़र बेहद दर्दनाक़ और असहनीय रहा। और जब उसके गुज़र जाने का वक़्त आया, तो ऐसे कई पल थे जब आँसुओं के सिवा मेरे पास कुछ भी नहीं बचा था।
और उसी वक़्त मैं ख़ुद से यह भी सोचती थी, “इसका फ़ायदा ही क्या है? मेरे आँसू क्या ही हालात बदल देंगे?”
लेकिन अपने दर्द को छुपाने या नज़रअंदाज़ करने से कहीं ज़्यादा उसे महसूस करना और उदासी के लिए जगह देना फ़ायदेमंद होता है। यह सिर्फ़ मनोविज्ञान का अनुसंधान ही नहीं, बल्कि यह बाइबल का भी एक उसूल है।
ख़ुदा के कलाम में यह कहीं नहीं लिखा हैं कि, “मर्द को आँसू नहीं बहाना चाहिए” या “अपने जज़्बातों को छिपाना चाहिए।”
बाइबल आँसुओं के बारे में यह कहती है:
*“तू मेरी सारे दुखों का हिसाब रखता है; तूने मेरे आँसुओं को अपनी कुप्पी में सँजोकर रखा है। मेरे हर एक आँसू को क़िताब में दर्ज किया हैं।” HINOVBSI — भजन संहिता ५६:८
स्वर्ग में सड़कें सोने की बनी हैं (प्रकाशितवाक्य २१:२१), लेकिन आँसुओं को बड़ी एहतियात से एक बोतल में जमा किया जाता है। इससे आप क्या समझते हैं?
ख़ुदा सिर्फ़ आपके आँसू देखता ही नहीं है, वह उन्हें सँभालकर भी रखता है।
तो जब भी रोने का मन करे, अपने आँसुओं को बहने दें, वे ख़ुदा के लिए सोने से भी ज़्यादा क़ीमती हैं।