ज़िंदगी की मुश्किलों से गुज़रने की कुंजी यह है कि आप उन्हें अकेले न झेलें।
ज़ैक के २०२० में बीमार पड़ने से लेकर उसके २०२५ में गुज़र जाने तक, ऐसे बहुत-से दिन थे जो बेहद मुश्क़िल, दर्दनाक़, जज़्बाती और आंसुओं से भरे हुए थे।
अस्पताल में बिताए गए दिन हमेशा भारी होते थे। वे रातें भी ज़्यादा मुश्क़िल थी जब ज़ैक असहज होता था या दर्द में होता था। कई दफ़ा, हमने चमत्कार की उम्मीद से उसे कई चंगाई की सभा में ले गए, लेकिन वहाँ से बिन-जवाब मिली दुआओं की मायूसी के साथ फ़िर घर लौट आए। और फ़िर कुछ “ख़ास” दिन भी थे जैसे जन्मदिन, मदर्स डे या फादर्स डे जो अपने साथ एक अलग ही क़िस्म का ग़म लेकर आते थे, क्योंकि वे वैसे बिल्कुल नहीं दिखते थे जैसे हमने उन्हें अपने ख़यालों में सोचा था।
आज जब मैं पीछे मुड़कर उन दिनों के सबसे अच्छे और सबसे यादगार लम्हों के बारे में सोचती हूँ, तो वे ज़्यादातर दूसरों के साथ जैसे दोस्तों, परिवार और कलीसिया के लोगों के साथ बिताए गए दिन थे।
बिना किसी अपवाद के, जिन पलों ने हमारी इस राह को थोड़ा आसान या सहने लायक बनाया, वे वही थे जो दूसरे ईमानदार लोगों या उन लोगों के साथ गुज़रे जो ख़ुद भी तकलीफ़ से गुज़र रहे थे और जो सच में समझते थे कि हम किस दौर से गुज़र रहे हैं।
ज़िंदगी की मुश्किलों से गुज़रने की कुंजी यह है कि आप उन्हें अकेले न झेलें।
*“एक-दूसरे के बोझ उठाओ और इस तरह मसीह की व्यवस्था को पूरी करो।” HINOVBSI — गलतियों ६:२
ख़ुदा ने हमें इसीलिए नहीं बनाया कि हम अकेले चलें। हाँ, कुछ वक़्त और मौसम ऐसे होते हैं जब हमें तन्हाई की दौर से होकर गुज़रना पड़ता हैं, लेकिन आम तौर पर हमे इस दुनिया में, एक-दूसरे के साथ जीने के लिए बनाया गया हैं।
*“इस बात को समझ ले कि हम एक-दूसरे को मोहब्बत और अच्छे कामों के लिए उकसाएँ। इकट्ठा होना न छोड़ें, जैसे कुछ अब भी इकट्ठा हो रहे हैं और एक-दूसरे को हौसला देतें रहें।” HINOVBSI — इब्रानियों १०:२४–२५
मैं पूरे यक़ीन से कह सकती हूँ कि अपने बोझ को ईमानदार विश्वासियों के साथ साझा करने और उनसे मदद लेने से, मुश्क़िल से मुश्क़िल हालात में भी ताक़त और होंसला हासिल होता है।
*“दो, एक से बेहतर हैं क्योंकि यदि उनमें से एक गिर जाए, तो दूसरा अपने साथी को उठा लेगा। पर अफ़सोस उस पर जो अकेला हो और गिर पड़े और उसे उठाने वाला कोई न हो।” HINOVBSI — सभोपदेशक ४:९–१०
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