हम कितनी बे-वजह तकलीफ़ उठाते रहते हैं, सिर्फ़ इसलिए कि हम सब कुछ दुआ में ख़ुदा के पास नहीं ले जाते! - जोसेफ एम. स्क्रिवन
हर दिन, सिर्फ़ १० मिनट की दुआ, मेरे पूरे दिन को बदल देती है। मेरी आत्मा को जगाने, मेरा नज़रिया बदलने, मेरी फ़िक्र या मेरे दर्द को कम करने के लिए इससे ज़्यादा असरदार कुछ भी नहीं है जितना कि दुआ में समय बिताना।
मुझे हमेशा हैरानी होती है कि, मुश्क़िल समय में, दुआ करना मेरा पहला क़दम नहीं होता हैं। कभी-कभी इसमें काफ़ी वक़्त लग जाता है, जिसमें मैं फ़िक्र करती हूँ, रूठ जाती हूँ, नाराज़ होती हूँ या अपनी योजनाएँ बनाती हूँ, इससे पहले कि मुझे याद आए कि पौलुस सही था जब उसने लिखा:
*“किसी बात की फ़िक्र न करें, बल्कि हर हाल में, दुआ और मिनत के ज़रिये, शुक्रगुज़ारी के साथ अपनी अर्ज़ियाँ ख़ुदा के सामने पेश करें। तब ख़ुदा की वह शांति, जो हर समझ से परे है, मसीह यीशु में तुम्हारे दिलों और मन की हिफ़ाज़त करेगी।” — फिलिप्पियों ४:६-७ HINOVBSI
जब हम दुआ करते हैं, तो ख़ुदा हमसे बात करता है। कभी किसी ख़याल या प्रकाशन के ज़रिए, कभी हमारी हालत का जवाब देकर, लेकिन ज़्यादातर वह हमारे दिलों में सुक़ून, ख़ुशी और ताक़त भर देता है।
ख़ुदा की यही ख़्वाहिश है कि हम उसे ज़िंदगी के हर हिस्से में शामिल करें। ऐसा करने पर वह अपने तरीक़े से जवाब देता हैं जो शायद हमारी उम्मीद या मर्ज़ी के मुताबिक़ नहीं हैं, लेकिन वह हमारी हर दुआ सुनता हैं और हमारी मदद के लिए सदा हाज़िर होता हैं।
आज मैं आपको अपने सबसे पसंदीदा भजनों में से एक भजन की कुछ पंक्तियाँ साझा करना चाहती हूँ: यीशु मसीह में हमें कैसा सच्चा दोस्त मिला है:
हम ज़हनसीब है क्योंकि हम अपनी हर बात को दुआ में,ख़ुदा के सामने पेश कर सकते हैं!कितना सुक़ून हम गँवा देते हैं,और कितनी बे-वजह तकलीफ़ उठाते रहते हैं,सिर्फ़ इसलिए कि हमसब कुछ दुआ में ख़ुदा के हवाले नहीं करते।