जब उसने हमारे साथ बातें कीं, क्या हमारे दिल के अंदर से आग नहीं जल रही थी?
सेवकाई करते वक़्त, कॅमरॉन और मैं कई लोगों से मिलते हैं और तरह-तरह के मसीही नेताओं के साथ बातचीत करते हैं। इनमें से ज़्यादातर मुलाक़ातें बहुत अच्छी होती हैं, लेकिन कभी-कभी कोई ऐसे लोग भी मिलतें हैं जो एक बहुत गहरा असर छोड़ जातें हैं और फिर हमें यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि वह असर अच्छा था या बुरा।
इस पर विचार करने के लिए हम एक तरीकें का इस्तेमाल करते हैं, जो इम्माऊस की राह पर चल रहे दो चेलों की कहानी से लिया गया है। कहानी के ज़्यादातर हिस्से में, चेलों को यह पता नहीं होता कि उनके सामने यीशु मसीह ही ख़ुद है। आख़िर में ही वे उसे पहचान पाते हैं और फ़िर वह गायब हो जाता हैं। (लूका २४:३१)
फ़िर वे एक-दूसरे से यह सवाल पूछते हैं:
*“जब उसने हमारे साथ बातें कीं, क्या हमारे दिल अंदर से आग नहीं जल रही थी?”— लूका २४:३२ HINOVBSI
जब भी कोई ख़ुदा की बातें करता हैं या कोई रूहानी सलाह या मार्गदर्शन देता हैं, तब कॅमरॉन और मैंने यही सिखा हैं कि अपने आप से यही एक सवाल पूछना चाहिए, क्या उस बात से हमारे दिल में आग जल रही थी या हमें ख़ुदा पर शक़ करने पर मजबूर?
इतने सालों में, हम कई बेहतरीन ख़ुदा का आदरयुक्त ख़ौफ़ रखने वालें, बाइबल के ज्ञानी और आत्मा से भरें लोगों से रूबरू हुए हैं। इनमें से एक बात आम थी: उनसे मिलने के बाद, आपका दिल यीशु मसीह के लिए पहले से जोशीला हो जाता है।
किसी के साथ बातचीत या कोई उपदेश के बाद, ग़ौर करे कि आपका दिल कैसा महसूस कर रहा है। क्या आप ख़ुदा के लिए और जोशीले बन रहे है, या उस मुलाक़ात या उपदेश ने आपको नीचा दिखाया हैं, या क़सूरवार ठहराया हैं, या शर्मिंदगी महसूस करवाया हैं, यहाँ तक की आपको ख़ुदा की मोहब्बत के क़ाबिल ही नहीं समझा?
यह जानने का एक अच्छा तरीका हो सकता है, कि बोले गए लफ्ज़ हक़ीक़त में यीशु मसीह की झलक थी या सिर्फ़ एक असरदार बात। क्योंकि जब वही बातें उपदेश के ज़रिए हम सुनतें हैं, तो हमारा दिल अंदर से जल उठता है।