यीशु मसीह ने चेलों को अपने जज़्बात से जूझने दिया और चुपचाप उनके साथ-साथ चलता रहा।
अपनी ज़िंदगी पर मनन करते हुए, आपने किन लम्हों में यीशु मसीह को अपने सबसे क़रीब महसूस किया है?
मेरे लिए, अजीब बात है कि वे लम्हे चर्च की मीटिंग्स, क्रूसेड्स या इबादत के कॉन्सर्ट्स में नहीं थे। वे ज़्यादातर अचानक आए हुए थे, लेकिन हमेशा बहुत ख़ास और क़रीबी, जैसे किसी सुक़ून की सैर के दौरान, या यहाँ तक कि जब मैं अपने बेटे के आई.सी.यू. के बिस्तर के पास बैठी हुई थी।
मुझे ग़लत मत समझना, मुझे चर्च जाना बहुत पसंद है और मैं बड़े उपासना सभाओं से पूरी तरह सहमत हूँ, लेकिन वे सब ख़ुदा की मौजूदगी को महसूस करने की कोई शर्त नहीं हैं।
इसी बात की वजह से मुझे इम्माऊस की राह पर चल रहे दो चेलों की कहानी बहुत प्यारी लगती है। जब वे गहरी बातचीत में होते हैं, तब यीशु मसीह अचानक सामने आता हैं और उनके साथ चलने लगता हैं। वो उन्हें साधारण अंदाज़ से पूछता हैं, “आप आपस में किस बात पर चर्चा कर रहे हैं?” (लूका २४:१७)।
न वहाँ कोई मंच पर उपासना अगुवे थे, न वे बहुत जोश से दुआ कर रहे थे या ख़ुदा को पुकार रहे थे। वे न उपवास, न क़लाम पर मनन, न शांती में वक़्त बिता रहे थे, वे बस ग़म को लिए चल रहे थे और बात कर रहे थे और उसी वक़्त यीशु मसीह ज़ाहिर हुआ।
यीशु मसीह, उन्हें न तो कोई उपदेश देता हैं और न ही डाँटता हैं; वो बस एक सवाल पूछकर उनके बातचीत में शामिल होता हैं। और जब वे “उन बातों” के बारे में बोलने लगते हैं जो हुई थीं, तो वह ऐसे दिखाता हैं जैसे उसे कुछ पता ही न हो और पूछता हैं, “कौन-सी बातें?” (लूका २४:१९)।
यीशु मसीह वहीं अपने आप को फ़िर से ज़िंदा मसीह के रूप में ज़ाहिर करके उनकी सारी उलझन दूर कर सकता था, लेकिन इसके बजाय उसने चेलों को अपने जज़्बातों से जूझने और जो कुछ हुआ था, उसे समझने का वक़्त दिया और ख़ुद उनके साथ-साथ चलता रहा। मुझे यीशु मसीह और उन चेलों की यह ख़ास नज़दीकी बहुत पसंद है।
क्या आपकी ज़िंदगी में भी कुछ बातें हैं जिनसे आप जूझ रहें हैं? अभी चल रही घटनाएँ? कोई अचानक आई मायूसी? उन्हें यीशु मसीह के साथ साझा करें। शायद आप सचमुच चलतें हुए उससे दिल की बातें करें, हो सकता है वो आपको किसी सवाल के ज़रिये चौंका दें। 😉