अनाथों और विधवाओं के ग़म में उनकी देखभाल करना।
भारत में हम अक़सर लोगों को “बेटा” या “बेटी” कहकर बुलाते हैं। न जाने कितनी आंटियों ने मुझे “बेटा” कहा है या मुझसे कहा है, “तुम तो मेरे बेटे जैसे हो!” और उसी तरह मैंने भी उनसे कहा है, “हाँ आंटी, आप तो मुझे मेरी माँ जैसी लगती हैं।” यह हमारे संस्कृति में किसी को मोहब्बत से अपनाने का एक प्यारा तरीक़ा है।
भारत में, जेनी के साथ पहली बार ऐसा कुछ तब हुआ जब एक दुकान में, एक बुज़ुर्ग आदमी उसके पास आया और उससे पूछा कि वह कहाँ रहती है और क्या काम करती है। वह थोड़ी घबरा गई और बात को टाल कर जाने लगी, तभी उस आदमी ने कहा, “डरो मत, मैं आपका पिता हूँ!” यह सुनकर वह और भी ज़्यादा घबरा गई। 😂
जब यीशु मसीह ने मरियम से कहा, *“हे नारी, यह है तेरा बेटा,” और यूहन्ना से कहा, “यह है तेरी माँ” (यूहन्ना १९:२६–२७ HINOVBSI), तो वह सिर्फ़ मोहब्बत भरे अल्फ़ाज़ नहीं थे।
यीशु मसीह ने उसकी माँ की ज़िम्मेदारी, यूहन्ना के हवाले की और अपनी माँ से कहा कि अब से, यूहन्ना उसका सबसे बड़ा बेटा बन कर उसकी देखभाल करेगा।
उस दौर में, एक विधवा को, समाज में नाज़ुक और कमज़ोर समझा जाता था। यूहन्ना का काम सिर्फ़ मरियम से माँ की तरह मोहब्बत करना नहीं था, बल्कि हक़ीक़त में उसकी ज़रूरतों और सेहत का ख़याल रखना और उसकी हिफ़ाज़त करना भी था।
यह हमें याद दिलाता है कि हमें भी दूसरों की ज़रूरतों की साफ़ तौर पर और व्यावहारिक रूप से देखभाल के लिए बुलाया गया है, ख़ासकर उनके लिए जो कमज़ोर हालातों से गुज़र रहे हैं।
*“एक ऐसी भक्ति जो हमारे ख़ुदा और पिता के मुताबिक़ पाक और बे-दाग़ है, वह यह है कि अनाथो और विधवाओं की देखभाल करना और ख़ुद को दुनिया की गंदगी से पाक रखा जाए।” — याक़ूब १:२७ HINOVBSI
आज आप सोच-समझकर किस तरह दूसरों की ज़रूरतों की देखभाल कर सकते हैं? क्या आप ऐसे लोगों को जानते हैं जो ख़ास तौर पर कमज़ोर हालत से गुज़र रहें हैं?