इस धरती पर चलने वाला सबसे अद्भुत, बे-दाग़, मोहब्बत से भरा और सबसे बुद्धिमान शख़्स, यीशु मसीह था।
वक़्त कितनी तेज़ी से गुज़रता है। हम ईस्टर से सिर्फ़ २ हफ्ते दूर हैं!
कुछ ही महीनो पहले हमने क्रिसमस पर यीशु मसीह के जन्म का जश्न मनाया था और अब सिर्फ़ १४ दिनों में हम क्रूस पर उसकी मौत को याद करने वाले हैं।
हक़ीक़त में, यीशु मसीह के जन्म और उसके क्रूस पर चढ़ाए जाने का फ़ासला, ३ महीने नहीं, बल्कि ३३ साल का था।
इन ३३ सालों में से, यीशु मसीह ने लगभग ३० साल गुमनामी में गुज़ारें और उसके जन्म, बचपन और सार्वजनिक सेवकाई में दाख़िल होने के दरमियान, बाइबल ख़ामोश हैं।
३० साल की उम्र में, यीशु मसीह ने ३ साल की सार्वजनिक सेवकाई की जिसमें उसने चेलों को तैयार किया, सिखाया, शिफ़ा दी और आख़िरकार क्रूस पर ख़ुद को क़ुर्बानी के रूप में अर्पण किया।
तीन साल कोई बहुत लंबा वक़्त नहीं है और फ़िर भी, यूहन्ना के मुताबिक़, यीशु मसीह ने इतने सारे चमत्कार किए कि:
“अग़र वे सब लिखे जाते, तो मैं समझता हूँ कि दुनिया की सारी क़िताबें कम पड जाएंगे।” – यूहन्ना २१:२५ HINOVBSI
यीशु मसीह ने कई महत्वपूर्ण शिक्षाएँ भी दीं, जैसे पहाड़ी उपदेश (मत्ती ५) और कई दृष्टांत भी।
लेकिन कहा जा सकता है कि उसकी कहीं हुई सबसे गहरी और सबसे प्रभावशाली बातें वे थीं, जो उसने अपनी मौत से पहले के आख़री घंटों में कहीं थीं।
आने वाले २ हफ्तों में, ईस्टर तक पहुँचते हुए, हम क्रूस पर यीशु मसीह के कहे गए आख़री ७ वचनों के ज़रिए ईस्टर के सच्चे मतलब को समझने की कोशिश करेंगे।
यीशु मसीह सिर्फ़ “ख़ुदा का बेटा” ही नहीं था जो हमारे ग़ुनाहों के लिए क़ुर्बान होने आया; बल्कि इस धरती पर चलने वाला सबसे अद्भुत, बे-दाग़, मोहब्बत से भरा और सबसे बुद्धिमान शख़्स, यीशु मसीह था।
उसकी ज़िंदगी और मौत, दोनों ने इतिहास बदल दिया और वही यीशु मसीह आपको उसका अनुसरण करने के लिए दावत दे रहा हैं।