ख़ुदा को, अपनी महिमा के लिए, आम लोगों का इस्तेमाल करना पसंद है।
इस हफ़्ते हम प्रेरितों के काम १२ में से, पतरस के जेल से आज़ादी की अलौकिक कहानी पर मनन कर रहे हैं। आज हम, इस कहानी के सबसे मज़ेदार हिस्से पर पहुँचे हैं। इतना हास्यास्पद कि जैसे कोई टॉम और जेरी की कॉमेडी वीडियो देख रहा हो!
जब पतरस को फ़रिश्ते ने जेल से आज़ाद किया, वह उसी घर गया जहाँ उसके मसीही दोस्त उसके लिए दुआ कर रहे थे:
*“पतरस ने दरवाज़े पर दस्तक दी, और रोड़ा नाम की एक दासी दरवाज़ा खोलने आयी। पतरस की आवाज़ पहचानकर, वह ख़ुशी से भरकर, दरवाज़ा खोले बिना ही भीतर दौड़ गई और बोली, ‘पतरस दरवाज़े पर हैं!’ उन्होंने कहा, ‘तु पागल हो गई हैं।’ लेकिन जब वह बार-बार कहती रही, उन्होंने कहा, ‘ज़रूर पतरस का फरिश्ता है।’” - (प्रेरितों १२:१३–१५)
रोड़ा इतनी ख़ुशी में मग्न हो गई कि दरवाज़ा खोलना ही भूल गई, और बेचारा पतरस—जो अब जेल से फरार माना जा रहा था—सड़क पर खड़ा रह गया। इस बीच अंदर लोग इस बात पर उलझे हुए थे कि बाहर पतरस है या उसका फ़रिश्ता! क्या आप सोच सकते हैं उस वक़्त वहाँ कितनी हलचल मची हुई थी? अग़र मैं पतरस के साथ खड़ा होता, तो शायद ज़ोर से चिल्ला उठता, “भाई, कोई तो दरवाज़ा खोल दो!”
हैरत की बात यह थी कि अंदर मौजूद लोगों को ज़्यादा यक़ीन था कि जो बाहर खड़ा है वह पतरस नहीं, बल्कि उसका फ़रिश्ता है—भले ही सच यह था कि पतरस ख़ुद जेल से आज़ाद होकर वहाँ खड़ा था।
मैं नहीं जानता कि आपके दरवाज़े पर कभी किसी फ़रिश्ते ने दस्तक दी है या नहीं—लेकिन मेरे साथ ऐसा कभी नहीं हुआ! लगता है कि उन मसीहियों को भी यकीन नहीं था कि पतरस किसी तरह जेल से निकल सकता था।
जब मैं इस कहानी पर ग़ौर करता हूँ, तो सबसे ज़्यादा मुझे यह बात छूती है कि यहाँ सारे किरदार कितने इंसानी हैं। भूल जाना, यक़ीन न कर पाना, घबराहट, शोर-शराबा, उत्साह, उलझन—मानो इंसानी जज़्बातों का पूरा मंज़र सामने हो।
हम कभी-कभी रूहानी अगुवों, जैसे पासबान या ख़ुदा के सेवकों को इतना ऊँचा दर्जा दे देते हैं कि हम मान लेते हैं वे बे-दाग़ और पाक हैं—लेकिन यह सोच पूरी तरह झूठ है。
यह कहानी आपको याद दिलाए कि ख़ुदा को, अपनी महिमा के लिए, आम लोगों का इस्तेमाल करना पसंद है। ख़ुदा, हम जैसे साधारण इंसानों के ज़रिये अपनी असाधारण और अज़ीम ताक़त ज़ाहिर करता है।