बे-जवाब दुआएँ, आपकी अर्ज़ीयाँ कम न करें।
मसीही होने की सबसे ख़ूबसूरत बातों में से एक यह है कि हम एक वैश्विक परिवार का हिस्सा हैं—एक ऐसा समुदाय जहाँ सभी भाई और बहन यीशु मसीह में जुड़े हैं। दुनिया में शायद ही कोई और मज़हब, विचारधारा या सामाजिक समूह हो, जहाँ लोग महज़ अपने ईमान की वजह से एक-दूसरे को परिवार की तरह अपनाएं।
इस मसीहीयों के समाज में हम जो सबसे शक्तिशाली काम कर सकते हैं, वह है मिलकर दुआ करना।
यीशु मसीह ने यह वादा किया हैं कि:
*“जहाँ दो या तीन लोग मेरे नाम से इकट्ठे होते हैं, वहाँ मैं उनके बीच हाज़िर होता हूँ।” (मत्ती १८:२०)
प्रेरितों के काम १२ में, हम सामूहिक दुआ का एक बेहतरीन मिसाल देखते है, जहाँ बहुत से लोग यूहन्ना की माँ, मरियम के घर इकठ्ठा होकर पतरस के लिए दुआ कर रहे थे, जो जेल में था और बहुत जल्द उसे मौत की सज़ा सुनाई जाने वाली थी (प्रेरितों के काम १२:१२)।
सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि जहाँ पतरस के दोस्त पूरी लगन और जुनून के साथ उसके लिए दुआ कर रहे थे, पतरस ख़ुद जेल में, ज़ंजीरों से बंधा, गहरी नींद में पूरी शांति के साथ सो रहा था। मुझे पतरस का यह अंदाज़ बहुत पसंद है—एक दोस्त मुसीबतों के बीच आराम में, और बाकी दोस्त दुआओं के ज़रिए उसके बोझ को साझा कर रहे हैं। (प्रेरितों १२:६–७)। उसी तरह, जब हमारा बेटा ज़ैक आई.सी.यू में अपनी ज़िंदगी के लिए लड़ रहा था, जेनी और मैं उसकी देख़भाल में लगे थे और दुनिया भर के लोग हमारे लिए दुआ कर रहे थे।
एक और बात जो मुझे बहुत गहराई से छू गई, वह यह है कि उन मसीहीयों ने दुआ करना कभी बंद नहीं किया, हालाँकि कुछ ही दिन पहले उनके दूसरे दोस्त, याकूब को मार दिया गया था। यक़ीनन उन्होंने याकूब के लिए भी दुआ की होगी, और फ़िर भी उस वक़्त ख़ुदा ज़ाहिर नहीं हुआ। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी; वे फ़िर से खड़े हुए और लगातार दुआ करने लगे।
क्या आपकी ज़िंदगी में भी ऐसी बे-जवाब दुआएँ हैं? या शायद आप उसी दुआ को दोहराते-दोहराते थक गए हैं? आज मैं आपको यह याद दिलाना चाहता हूँ कि हालात चाहे कैसे भी हों, दुआ करना कभी न छोड़ें। अपने हर बोझ, हर उम्मीद, हर आँसू को दुआ में ख़ुदा के सामने पेश करते रहें, क्योंकि ख़ुदा आपकी पुकार सुनता है और उसके मुक़म्मल वक़्त में जवाब भी देता है。