ख़ुदा आपकी सच्चाई को, आपकी सकारात्मकता से ज़्यादा चाहता है।
मसीहीयों के बीच एक बड़ी गलत-फ़हमी आम तौर पर पाई जाती है — वह यह है कि, जैसे ही कोई अपनी ज़िंदगी को पूरी तरह यीशु मसीह के हवाले कर देता है, उसके बाद की ज़िंदगी मानो बिना किसी मुसीबत, दर्द या चुनौती के, आसानी से गुज़र जाएगी। आजकल ऐसा पैग़ाम हर तरह सुनाया जाता है, लेकिन हक़ीक़त इससे कई ज़्यादा गहरी और अलग है।
जब भी मैं किसी मसीही को यह कहते हुए सुनता हूँ, “ख़ुदा के फ़ज़ल से अब हमारे साथ कभी कुछ बुरा नहीं होगा,” तो सच कहूँ, मेरा दिल टूट जाता है। क्योंकि अभी नहीं तो कल—कभी-न-कभी—हक़ीक़त उनसे टकराएगी ही। और जब ऐसा होगा, तो इस ग़लत उम्मीद का बोझ उनके ईमान, उनके हौसले और उनके ख़ुदा के साथ रिश्ते पर अनावश्यक चोट पहुँचा सकता है।
ख़ुद यीशु मसीह ने फ़रमाया:
*“मैंने तुमसे ये बातें इसलिए कही हैं कि मुझमें, तुम्हें सुक़ून मिले। दुनिया में तुम्हें मुसीबतें झेलनी पड़ेगी; मग़र होंसला रखे क्योंकि मैंने दुनिया पर जित हासिल की है।” - (यूहन्ना १६:३३)
यहाँ तक कि यीशु मसीह के अपने चेले भी, मुश्क़िलों और आज़माइशों से अछूते नहीं रहे। इतिहास गवाही देता है कि बारह में से सिर्फ़ एक—यूहन्ना—ने बुढ़ापे में स्वाभाविक मृत्यु पाई, जबकि बाक़ी सभी ने अपने ईमान की गवाही देते हुए बेहद क्रूर और दर्दनाक मौतों का सामना किया।
प्रेरितों के काम १२ में हम देखते हैं कि कैसे राजा हेरोद ने याकूब (यूहन्ना का भाई) को तलवार से मरवा दिया - और जब उसने देखा कि इस बेरहम क़दम से उसे यहूदियों की वाहवाही मिल रही है, तब उसने पतरस को भी उसी अंजाम तक पहुँचाने की ठान ली।
लेकिन शुक्र है उस ख़ुदा का, जो अपने वक़्त पर और अपने तरीक़े से काम करता है। पतरस को आख़री लम्हों में एक फ़रिश्ते के ज़रिए जेल से चमत्कारिक तौर पर छुड़ाया गया।लेकिन अक़सर जब यह कहानी उपदेश के ज़रिए सुनाई जाती है, तो ध्यान सिर्फ़ चमत्कार पर ही रखा जाता है: “ख़ुदा हमें भी उसी तरह बचाएगा जिस तरह पतरस को बचाया!” या “कोई ज़ंजीर हमें रोक नहीं सकती!”
मगर हम अक्सर उस हिस्से को नज़रअंदाज़ कर देते हैं जहाँ ख़ुदा ने याकूब को बेरहम मौत से नहीं बचाया, और जहाँ पतरस को भी चार बटालियन के पहरे, यानी हद से ज़्यादा सख़्त सुरक्षा व्यवस्था, दो सिपाहियों के बीच, और जंजीरों में बाँधकर जेल में क़ैद होने की इजाज़त दी।(प्रेरितों के काम १२:१–६)।
ज़िंदगी में संघर्ष और मुश्क़िलें, दोनों हक़ीक़ी है। अग़र यीशु मसीह ने ख़ुद कहा, “दुनिया में तुम्हें मुसीबतें झेलनी पड़ेगी,” तो यह बिल्कुल ठीक है कि आप यह कहें: “मैं मुसीबत का सामना कर रहा हूँ।”
यह मान लेना कि ज़िंदगी में सब कुछ ठीक नहीं है — यह न तो आपके ईमान की कमज़ोरी का सबूत है, और न ही यह कि ख़ुदा आपको किसी सज़ा से गुज़ार रहा है।
बल्कि यह इस बात का इकरार है कि आप सच्चाई का सामना कर रहे हैं और यह भरोसा रखते हैं कि ख़ुदा आपकी टूटी, बिखरी, या मुश्किल हालात में भी मौजूद है और वही आपको संभाल रहा हैं।
ख़ुदा आपकी सच्चाई को, आपकी सकारात्मकता से ज़्यादा चाहता है।