मैं ही हूँ, जो तेरे गुनाह मिटाता हूँ।
क्या आपके अतीत की कोई ऐसी ग़लती है जो आज भी दिल को चुभती है? कोई ऐसा लम्हा जो याद आते ही भीतर एक हल्की‑सी झिझक या कसक छोड़ जाती है? शायद—हाँ, शायद—हम सबने कभी‑न‑कभी ऐसा महसूस किया है।
हम अक़सर अपनी ग़लतियों को अपनी असफ़लताओं से ज़्यादा याद रखते हैं। हम उन्हें बार-बार अपने ज़हन में दोहराते रहते हैं, यह सोचते हुए कि क़ाश हमने उस वक़्त कुछ अलग़ किया होता। हमसे कोई ग़लती हो जाए तो अक़सर हम उसी में उलझे रह जाते हैं, जैसे उस पर फ़िक्र करने से नतीजा बदल जाएगा या वो बात मिट जाएगी। क्या आपको ये बात जानी-पहचानी लगती है?
पर अच्छी ख़बर यह है, ख़ुदा हमारे पिछले गुनाहों को याद नहीं रखता, न इसलिए कि वो भूल जाता है, बल्कि इसलिए कि वो ख़ुद भूल जाना चुनता है।
*“मैं ही हूँ, जो अपने ही ख़ातिर तेरे गुनाह मिटाता हूँ, और उन गुनाहों को फ़िर कभी याद नहीं करता।” - यशायाह ४३:२५
अगर ख़ुदा ने तय किया है कि वो हमारे गुनाहों को याद नहीं रखेगा, तो फ़िर हमें क्यों बार-बार उन्हें याद करके ख़ुद को सताना चाहिए?
*“पूरब जितनी पश्चिम से दूर है, उतनी ही दूर उसने हमारे गुनाहों को हमसे हटा दिया है।” - भजन संहिता १०३:१२
ख़ुदा सिर्फ़ हमारे गुनाहों को भुलाता नहीं, वो उन्हें हमसे दूर भी कर देता है। तो फ़िर क्यों हम उन यादों को बार-बार अपने दिल में जगह दें?
अब वक़्त आ गया है, कि आप अपनी पुरानी ग़लतियों को छोड़ दें और ख़ुदा को उन्हें सदा के लिए मिटाने दें। वो कैसे? उन ग़लतियों को क़ुबूल करके - और फ़िर बाकी काम ख़ुदा पर छोड़ दें।
*“यदि हम अपने गुनाहों को मान लें, तो वो जो सच्चा और इंसाफ़ी है; हमारे गुनाह माफ़ कर देगा, और हमें हर नापाक़ी से पाक़ कर देगा।” - १ यूहन्ना १:९
आओ मिलकर दुआ करें।
ऐ आसमानी पिता, मैंने _________ यह ग़लती की है और यह मेरे ज़हन में बस गई है। आज मैं इसे तेरे सामने क़ुबूल करती हूँ, छोड़ देती हूँ और तुझसे दरख़्वास्त करती हूँ कि इसे सदा के लिए मिटा दें। मेरे गुनाहों को माफ़ कर और मुझे पाक़ कर। तेरा शुक्रिया, यीशु मसीह के नाम में। आमीन।