अपनी समझ पर निर्भर नहीं, बल्कि अपने पूरे दिल से ख़ुदा पर ऐतबार करे।
जो मुझे सच में जानते हैं, उनके लिए यह कोई नई बात नहीं कि मुझे अपनी ज़िंदगी पर क़ाबू रखना पसंद है—दूसरों पर नहीं, बस ख़ुद पर। जब चीज़ें मेरी हदों और मेरे तरीक़ों के भीतर सलीके से चलती हैं, तभी मैं अपने आप को सबसे ज़्यादा महफ़ूज़ महसूस करती हूँ।
मग़र ख़ुदा कभी यह नहीं चाहता कि हम ज़िंदगी की हर उलझन अपने दम पर सुलझाएँ। बल्कि वह हमें एक नर्म-सी दावत देता है—कि हम सब कुछ उसके हवाले करें और पूरी दिली यक़ीन के साथ उस पर ऐतबार रखें। अपनी क़ाबिलियत या ताक़त पर नहीं, बल्कि उसके महफ़ूज़ हाथों पर भरोसा रखें—वही हाथ जो हमारी ज़िंदगी को सँभालते, थामते और सबसे बेहतरीन मंज़र में ले जाते हैं।
मेरे सबसे पसंदीदा शिक्षक, डॉ.एम.रॉबर्ट मलहॉलंड जूनियर, ने इस पर बहुत ख़ूबसूरती से कहा है:
“हमारा रूहानी सफ़र, ख़ुदा को ढूंढने का नहीं, बल्कि यह सीखने का है कि हम कैसे अपने आप को उसके के हवाले करें और ये जाने कि वो हमें अपनी मंज़िल तक ले जायेगा।”
हवाले करने का मतलब है अपने क़ाबू को छोड़ देना।
हमारी ज़िंदगी लगातार ‘बेहतर’ बनने या ‘ज़्यादा पाक’ दिखने के दबाव के लिए नहीं बनी हैं। ख़ुदा हमें एक यक़ीनी, अमन-बख़्श सफ़र पर बुलाता है — जहाँ वो ही हमारी रहनुमाई करता है और हमें अपनी राह पर चलाता है।
“अपनी समझ पर निर्भर नहीं, बल्कि अपने पूरे दिल से ख़ुदा पर ऐतबार करे। सारी बातों में ख़ुद को उसके हवालें करे और वो तुम्हारे रास्तों को सीधा करेगा।” – नीतिवचन ३:५-६
ख़ुदा हमें क़ाबू की चाह को छोड़ देने के लिए बुलाता है। यह आसान नहीं है, लेकिन ख़ुद की आज़ादी इसी में है। मैं इसका अभ्यास, अपनी तन्हाई और ख़ामोशी के वक़्त में करती हूँ। मिसाल के तौर पर, १५ मिनट निकालकर ख़ामोश बैठती हूँ, बिना कोई संगीत, फ़ोन, ध्यान भटकाने वाली चीज़ के। आप भी ऐसा कर सकते है। जब आप तन्हाई और ख़ामोशी में बैठें, तो एक पल ठहरकर सोचें — आपने अपनी मुट्ठियों में ज़िंदगी के कितने हिस्से कसकर पकड़े हुए हैं: काम की थकान, परिवार की फ़िक्रें, आर्थिक बोझ, और संघर्ष की वो ज़ंजीरें।अब धीरे से अपने हाथ खोलें और कहें: “ऐ ख़ुदा, मैं ये सब तेरे हवाले करती हूँ। अब मैं सिर्फ़ तुझ पर ही ऐतबार करना चाहती हूँ।”
मैं आपको भी इसे आज़माने के लिए न्योता देती हूँ। शायद आपको तुरंत कुछ अलग महसूस न हो, और आपकी परेशानियाँ जादू की तरह ग़ायब न हों, पर यह छोटा-सा क़दम — ख़ुद के क़ाबू को छोड़कर, ख़ुदा पर ऐतबार करना, आपके रूहानी सफ़र की सबसे ख़ूबसूरत शुरुआत हो सकती है।