अब मैं ख़ुद नहीं, बल्कि मसीह मुझ में ज़िंदा है।
क्या आप जानते हैं कि सुपर हीरोज़ की फ़िल्में इतनी मशहूर क्यों होती हैं?
क्योंकि हम सबको ये सोचने में अच्छा लगता है कि अग़र हम उस हीरो की जगह होते, तो हम भी उसी तरह दबंग और दलेर होते। हम अपने आपको उस भलें इंसान से जोड़ पाते हैं और हमें ये यक़ीन होता है कि हम सबके अंदर भी एक हीरो छिपा है।
लेकिन ज़रा सोचिए, क्या हो अग़र हमारा रवैया या हमारी शख़्सियत हीरो से ज़्यादा, विलन (बुरे क़िरदार) से मिलती-जुलती हो? क्या आपने कभी ऐसा सोचा है? 🤔
दाऊद और गोलियात की कहानी पर मेरा एक थोड़ा अलग नज़रिया है: हो सकता हैं कि हमारा रवैया दाऊद से ज़्यादा, गोलियात से मिलता है। 😳
गोलियात, सारी बुराइयों का एक ज़िंदा प्रतीक था —वो ख़ुदपरस्त था और उसने ख़ुदा को ललक़रने की जुर्रत की। उसका अहंकार इतना बड़ा था कि उसे लगता था कि वो अजेय वीर था।
असल में वो एक “बड़ा गुनहगार” था और यह मानना मुश्क़िल हो सकता है, मग़र कही न कही, हम भी वैसे ही हैं।
*“क्योंकि सब ने गुनाह किया है और ख़ुदा की महिमा से महरूम हो गए हैं।” – रोमियों ३:२३
बाइबल कहती है की जैसे गोलियात का मर जाना ज़रूरी था वैसे ही हमें भी “मरना” ज़रूरी है:
*“मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ, अब मैं ख़ुद नहीं,, बल्कि मसीह मुझमें ज़िंदा हैं। और जो ज़िंदगी मैं अब इस जिस्म में जीता हूँ, वह मैं ख़ुदा के बेटे पर ईमान रखकर जीता हूँ, जिसने मुझसे मोहब्बत की और अपने आप को मेरे लिए क़ुर्बान कर दिया।” – गलातियों २:२०
जैसे दाऊद ने गोलियात को परास्त करके बुराई पर जीत हासिल की, वैसे ही हमें भी यह ख़ूबसूरत मौक़ा मिला है कि हम यीशु मसीह, जो दाऊद का बेटा कहलाया जाता है (मत्ती १:१) के साथ क्रूस पर अपने पुराने स्वभाव और गुनाह को मारकर, एक नई और उम्मीद से भरी ज़िंदगी प्राप्त कर सके। क्रूस सिर्फ़ मसीह की मौत की निशानी नहीं हैं, बल्कि हमारी पुनर्जीवित ज़िंदगी का आग़ाज़ है — जहाँ हार को जीत में, और बुराई को भलाई में बदल दिया जाता है।
*“क्या तुम नहीं जानते कि हम सब जिन्होंने मसीह यीशु में बपतिस्मा लिया हैं, उसके मौत में भी बपतिस्मा लिया हैं? उसके साथ, हम मौत में बपतिस्मा लेकर दफ़न हुए हैं, ताकि जैसा पिता के जलाल के ज़रिये, यीशु मसीह मरे हुओं में से ज़िंदा हुआ, वैसे ही हम भी नई ज़िंदगी में चलें। क्योंकि यदि हमने उसकी मौत में एकता पाई हैं, तो यक़ीनन हम उसके पुनरुत्थान में भी एक होंगे।” – रोमियों ६:३–५
हमारा ‘दाऊद’ (यीशु मसीह) हमें गोफ़न से नहीं मारता हैं, बल्कि बपतिस्मा के ज़रिए, हमारी पुरानी ज़िंदगी को दफ़न कर देता है, ताकि हम उसके साथ फ़िर से जी उठें।
यह वाक़ई में अज़ीम बात है, हैं ना?