हमने अपनी उम्मीद उसी पर रखी है कि वह आगे भी हमें बचाता रहेगा।
ज़िंदगी का एक अजीब सिलसिला है: हम अच्छी बातों को कितनी जल्दी भूल जाते हैं और बुरी बातों को कितनी आसानी से याद रखते हैं।
मैंने कही सुना था कि अग़र किसी को कोई तकलीफ़देह बात को भुलाना है, तो उसके बदले में दूसरे व्यक्ति को कम से कम दस तारीफ़ें करनी पड़ती हैं ताकि वह दर्दनाक़ याद मिट सके।
जब मैं दाऊद और गोलियात की कहानी को देखती हूँ, तो मुझे लगता है कि जो बात दाऊद को बाक़ी सारे सैनिकों से, जो गोलियात से लड़ने से डर रहे थे, अलग बनाती थी — वो यह थी कि उसने अपनी पिछली जीतों को याद रखना चुना।
जब राजा शाऊल ने, गोलियात से लड़ने के लिए, दाऊद से कहा कि वह बहुत छोटा और अनुभवहीन है, तब दाऊद ने यह जवाब दिया:
*“जब मेरी भेड़ की झुंड में से किसी भेड़ को कोई शेर या भालू उठा ले जाता था, तब मैं उसका पीछा करके उसे मार गिराता था और अपनी भेड़ को उसके मुँह से छुड़ा लाता था। तेरे दास ने शेर और भालू, दोनों को मार डाला है; यह बेख़तना फ़िलिस्ती भी उनके जैसा ही है।” (१ शमूएल १७:३३–३६)
यह सोचना भी मुश्किल है कि राजा शाऊल की पूरी फ़ौज में और कोई अनुभवी योद्धा नहीं था जिसने पहले की जंगो में बड़ी जीतें न देखी हों। फ़िर भी, हम पढ़ते हैं कि राजा शाऊल ख़ुद और उसकी पूरी फ़ौज, गोलियात से लड़ने से डर गए थें। (१ शमूएल १७:११)
लेकिन दाऊद ने, गोलियात की ताक़त के बजाय, ख़ुदा की वफ़ादारी पर ग़ौर करना चुना। दाऊद को पूरा यक़ीन था की जिस ख़ुदा ने उसे शेर और भालू से बचाया, वही ख़ुदा अब उसे गोलियात से भी जीत दिलाएगा।
पौलुस के अंदर भी यही जज़्बा था जब उसने यह लिखा —
*“असल में हमने तो यह समझ लिया था कि हमारे लिए मौत का फ़ैसला हो चुका है। मग़र यह इसलिए हुआ कि हम अपने ऊपर नहीं बल्कि उस ख़ुदा पर यक़ीन करना सीखें, जो मुर्दों को ज़िंदा करता है। उसी ने हमें उस भयानक ख़तरे से बचाया, और वह फ़िर हमें बचाएगा। हमने अपनी उम्मीद उसी पर रखी है कि वह आगे भी हमें बचाता रहेगा।” (२ कुरिन्थियों १:९–१०)
आज कुछ वक़्त निकालकर अपनी जीतों और क़ामयाबियों को याद करें। वो कौन से पल थे जब आपने अपनी ज़िंदगी में ख़ुदा की वफ़ादारी का अनुभव किया था? उन्हें याद करके ख़ुदा का शुक्र अदा करे。