हम तो बस मिट्टी हैं, तू हमारा कुम्हार है।
हम इस सीरीज़ के आख़री दिन तक़ पहुँच चुके हैं।
इस हफ्ते में पूछे गए सवालों के जवाब, शायद आपके पास अभी न हो। हो सकता है कि आपको उन पर थोड़ा और ग़ौर करना पड़ेगा — जो बिलकुल जायज़ है! यह कोई इम्तिहान नहीं है जिसे आपको पास करना है, बल्कि यह एक ख़ास मौक़ा है यह जानने का कि इस नए साल में ख़ुदा आपके दिल से क्या कहना चाहता है।
हर दिन, मैंने आपको एक सवाल पूछा, लेकिन आज मैं इस सीरीज़ को उस सवाल के साथ ख़त्म करना चाहता हूँ जो आप ख़ुदा से पूछ सकते हैं: "ऐ आसमानी पिता, इस साल आप मुझमें क्या रचाना चाहते हैं?"
ख़ुदा की यही आरज़ू है कि हम वैसे ही बनें जैसे वह चाहता है - उसकी मर्ज़ी के मुताबिक़।
मैक्स लुकाडो लिखते हैं:
“ख़ुदा आपसे उसी तरह मोहब्बत करता है जैसे आप हैं, मगर वो आपसे इतनी गहरी मोहब्बत करता है कि आपको उसी हाल में रहने नहीं देता हैं।”
यह कितना सच है! ख़ुदा, अपनी बेहिसाब फ़ज़ल में, हमें लगातार भीतर से बदलते रहता है और हमें ख़ूबसूरती, सुक़ून, मोहब्बत और ताक़त से भरता है। इस बात को समझते हुए यशायाह ने लिखा:
*“पर तू, ऐ ख़ुदावंद, हमारा पिता है। हम तो बस मिट्टी हैं, तू हमारा कुम्हार है। हम सब तेरे हाथों की हस्तकला हैं।”– यशायाह ६४:८
इस क़ायनात की प्रक्रिया में, मिट्टी काफ़ी हद तक निष्क्रिय होती है; वह बस मिट्टी है। लेकिन कुम्हार सारी मेहनत करता है; वह मिट्टी को उठाता है, उसे आकार देता है और इस्तेमाल के क़ाबिल बनाता है।
अपनी ज़िंदगी में हमें कई बातों और आदतों को विकसित करना पड़ता हैं, लेकिन कुछ चीज़ें हैं जो सिर्फ़ ख़ुदा ही हमारे अंदर बना सकता हैं अग़र हम उसे इजाज़त दें।
मेरे साथ यह दुआ करें:
"ऐ आसमानी पिता, शुक्रिया कि तू मेरा कुम्हार है और तूने मुझे रचाया है। मेरा दिल उन सभी चीज़ों के लिए तैयार हैं जो तू मेरे अंदर बदलना चाहता हैं। मैं ख़ुद को तेरे हवालें करता हूँ - मुझ में तेरी मर्ज़ी पूरी हो और इस प्रक्रिया में मुझे, नम्र और सिखने वाला बना। यीशु मसीह के नाम में, आमीन।"